Google Analytics Meta Pixel शिव मंदिर दिन में दो बार दर्शन देकर समुद्र में हो जाता है गायब - Ekhabri.com

शिव मंदिर दिन में दो बार दर्शन देकर समुद्र में हो जाता है गायब

श्री स्तम्भेश्वर महादेव मंदिर अरब सागर और खंभात की खाड़ी से घिरा है। यह मंदिर 150 वर्षों से भी ज्यादा पुराना है। आप इस प्राचीन मंदिर का दर्शन और चमत्कार देखना करने का चाहते हैं तो सुबह से रात तक रुकना होगा, तभी आप मंदिर को जलमग्न होते हुए देख सकते हैं। समुद्र में होने के कारण जब-जब पानी का स्तर काफी बढ़ जाता है, तो यह मंदिर समुद्र में समाकर दिखना बंद हो जाता है लेकिन जैसे-जैसे समुद्र के पानी का स्तर घटता जाता है, यह मंदिर फिर से दिखाई देने लग जाता है। इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इस मंदिर के दर्शन वही लोग कर पाते हैं, जिन्हें भगवान शिव ने खुद चुना होता है। अगर आपके हाथों कोई भूल या पाप हो गया है, तो यहां आकर आप प्रायश्चित कर सकते हैं। यहां आने वाले शिवभक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

 

 

 

इस मंदिर के स्थापित होने के पीछे एक पौराणिक कहानी है। ताड़कासुर नामक राक्षस भगवान शिव का भक्त था। उसने भगवान शिव की तपस्या करके उन्हें प्रसन्न कर दुर्लभ वरदान मांगा। ताड़कासुर ने वरदान मांगा कि उसे अमरता का वरदान चाहिए। यह सुनकर भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए कहा कि इस संसार में अमर नहीं हो सकता। यह सुनकर ताड़कासुर ने कहा कि उसे यह वरदान चाहिए कि इस संसार में कोई भी उसका संहार ना कर सके, सिवाय भगवान शिव के पुत्र के। अपनी बुद्धि लगाते हुए ताड़कासुर ने कहा कि भगवान शिव के पुत्र की आयु 6 दिन ही होनी चाहिए। भगवान शिव ने ताड़कासुर को यह वरदान दे दिया। भगवान शिव से वरदान प्राप्त करने के बाद ताड़कासुर का आंतक बढ़ने लगा था। वो चारों तरफ उत्पात मचाने लगा था। ताड़कासुर से परेशान होकर सभी देवगण और ऋषि-मुनि मिलकर भगवान शिव के पास गए और वहां जाकर उनसे ताड़कासुर का वध करने के लिए प्रार्थना करने लग गए। भगवान शिव ने इस विपदा को समझा और इसके बाद श्वेत पर्वत कुंड से भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय का जन्म हुआ। भगवान शिव के पुत्र जन्म से ही प्रतापी थे, इसलिए उन्हें ताड़कासुर को मारने में कोई कठिनाई नहीं हुई और भगवान कार्तिकेय ने ताड़कासुर का वध करके सभी देवताओं और ऋषि-मुनियों को उसके पाप कर्मों से मुक्ति दिला दी।

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जब कार्तिकेय को पता चला कि ताड़कासुर भगवान शिव का परम भक्त था, तो अपने हाथों एक शिवभक्त की हत्या होने का उन्हें बहुत ही दुख हुआ। उन्हें दुखी और अपराधबोध से ग्रस्त देखकर भगवान विष्णु ने उन्हें इस पाप से मुक्ति का मार्ग बताते हुए कहा कि जहां उन्होंने ताड़कासुर का वध किया है, वहां शिवलिंग की स्थापना करें। भगवान कार्तिकेय ने ऐसा ही किया। इस कारण मंदिर का नाम स्तम्भेश्वर महादेव का मंदिर पड़ गया।

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