Google Analytics Meta Pixel लोकतंत्र की जननी थीम पर छत्तीसगढ़ की झांकी ‘बस्तर की आदिम जनसंसद मुरिया दरबार’ - Ekhabri.com

लोकतंत्र की जननी थीम पर छत्तीसगढ़ की झांकी ‘बस्तर की आदिम जनसंसद मुरिया दरबार’

छत्तीसगढ़ में आदिम काल से लोकतंत्र की जड़ें विद्यमान हैं, इसका जीवंत उदाहरण मुरिया दरबार में देखने को मिलता है। भारत लोकतंत्र की जननी थीम पर बनी छत्तीसगढ़ की झांकी ने राष्ट्रीय मीडिया को खासा आकर्षित किया है। गणतंत्र दिवस पर कर्तव्यपथ पर निकलने वाली राज्यों की झांकियों का आज नई दिल्ली की राष्ट्रीय रंगशाला में प्रेस प्रीव्यू आयोजित किया गया। जहां ‘बस्तर की आदिम जनसंसद मुरिया दरबार’ विषय पर बनी राज्य की झांकी को राष्ट्रीय मीडिया की काफी सराहना मिली। इस दौरान झांकी के समक्ष छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों ने परब नृत्य का प्रदर्शन किया। वहीं, मांदर की थाप के साथ बांसुरी की मधुर तान ने सबका मनमोह लिया। यह झांकी छत्तीसगढ़ के बस्तर में आदिम काल से उपस्थित लोकतांत्रिक व्यवस्था को दिखाती है। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के समारोह में शामिल मुरिया दरबार की परंपरा आजादी के 75 साल बाद भी जारी है, जहां जनप्रतिनिधि व आमजन शामिल होकर क्षेत्र की समस्याओं पर चर्चा करते हैं। रियासत काल में जहां इसमें राजा शामिल होता था, वहीं अब मुख्यमंत्री भी शामिल होते हैं।

 

 

 

मुरिया दरबार में बस्तर में आदिम काल से लेकर अब तक हुए सांस्कृतिक विकास की झलक भी दिखाई पड़ रही है। झांकी के सामने के हिस्से में बस्तर के आदिम काल से स्त्री प्रधान जनजातीय समाज को दिखाया गया है। अपनी पारंपरिक वेशभूषा में एक स्त्री को अपनी बात रखते हुये दर्शाया गया है। युवती की पारंपरिक वेशभूषा के माध्यम से बस्तर के रहन-सहन, सौंदर्यबोध और सुसंकारित पहनावे को दर्शाया गया है। मध्य भाग में बस्तर की आदिम जनसंसद को दर्शाया गया है, जिसे मुरिया दरबार के नाम से जाना जाता है। 600 से अधिक वर्षों से यह परंपरा विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरे का हिस्सा है। लेकिन इसकी शुरुआत के प्रमाण आदिम काल के मिलते हैं।

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झांकी के पीछे के हिस्से में बस्तर की प्राचीन राजधानी बड़े डोंगर में स्थित लिमऊ राजा नाम के स्थान को दर्शाया गया है। लोककथाओं के मुताबिक आदि काल में जब कोई राजा नहीं था, तब जनजातीय समाज एक नीबू को पत्थर के प्राकृतिक सिंहासन पर रखकर आपस में ही निर्णय ले लिया करता था। इसी परंपरा को बाद में मुरिया दरबार के रूप में विस्तार पाया। झांकी की सजावट जनजातीय समाज की शिल्प-परंपरा के बेलमेटल और टेरकोटा शिल्पों से की गयी है। बेलमेटल शिल्प का नंदी सामाजिक आत्मविश्वास और सांस्कृतिक सौंदर्य का प्रतीक है। टेरकोटा शिल्प का हाथी लोक की सत्ता का प्रतीक है। परब नृत्य बस्तर की धुरवा जनजाति का लोकप्रिय नृत्य है। जिसमें युवक-युवतियाँ मिलकर नृत्य करते हैं। ये सभी कतारबद्ध होकर नृत्य करते हैं, एवं नृत्य के साथ विशेष करतब भी करते हैं।

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