जहाँ हमारा स्वार्थ समाप्त होता है वहाँ हमारी इंसानियत आरंभ होती है।
कहते हैं इंसान को अमीर होना चाहिए पर मुझे लगता है इंसान में जमीर होना चाहिए।
सिर्फ अपना नही सबका सोचो, यही सच्चा ईमान है। अपने लिए तो सब सोचते है और दूसरों के लिए सोचने वाले चुनिंदा हैं। एक बार किसी की मदद के लिए हाथ बढ़ा कर देखो। इस अच्छाई में वो सुकून महसूस होगा जो सिर्फ अपने लिए सोचने पर नही मिलता है।









