पवित्र मन से उपहार दें
एक उपहार तभी अलसी और पवित्र है जब वह हृदय से किसी सही व्यक्ति को सही समय और सही जगह पर दिया जाये, और जब उपहार देने वाला व्यक्ति दिल में उस उपहार के बदले कुछ पाने की उम्मीद ना रखता हो।
अगर देने के साथ लेने की उम्मीद भी जाग जाए तो वो उपहार नही बल्कि सौदा हो जाता है और अपनों के साथ आत्मीयता होती है। सौदे का कोई स्थान वहाँ नही होता।
इस लिए अगर हम किसी को कुछ दे रहे तो हमें वापस लेने की इच्छा नही होनी चाहिए।










