दुर्ग। ग्राम नंदकटठी के रहने वाले 70 वर्षीय कनक यादव ने अपने सीखने की ललक से एक अलग ही मिसाल कायम की है। पहले ग्रामीण अंचल में शिक्षा का विस्तार इतने बड़े पैमाने पर नहीं हुआ था जिसके चलते कनक यादव जी शिक्षा से वंचित रह गए थे। लेकिन आने वाली शिक्षित पीढ़ियों को देखकर उनके अंतर्मन में भी पढ़ने की ललक थी।
जब राज्य शासन द्वारा ‘‘पढना लिखना‘‘ अभियान की शुरुआत ग्राम नंदकटठी मे शुरु की गई तो स्वयं सेवी शिक्षिका दीपाली निषाद उनके घर पहुंची जहां उन्होंने शासन की योजना में कनक यादव को भागीदार बन शिक्षित होने का प्रस्ताव दिया। उम्र की दहलीज को देखते हुए कनक को असहजता महसूस हुई और उन्होंने शुरूआत में पढ़ने के लिये मना कर दिया। उनका कहना था कि इस उम्र में पढ़ाई करके मैं क्या करूँगा, लेकिन स्वयं सेवी शिक्षिका दीपाली ने उन्हें बताया कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती, पढने-लिखने के कई फायदे हैं, सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि आप आने वाली पीढ़ियों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते हैं।
कनक यादव अपने पोते-पोतियों को स्कूल जाते हुए देखते थे और यही कारण था कि सीखने की इच्छा उनके मन में कहीं दबी हुई थी। इसके पश्चात् उन्होंने खुशी जाहिर करते हुए, पढ़ने के लिए हामी भर दी। यह उनके जीवन का एक अनोखा अनुभव था, जिसे वह पूरी तरीके से जी रहे थे।
वह साक्षरता केन्द्र मे सबसे पहले पहुँच जाते थे और मन लगाकर पढ़ने की कोशिश करते थे। पढ़ने की ललक और मेहनत ने आज उन्हें निरक्षर से साक्षर बना दिया। पहले बैंक, शासकीय या अशासकीय कार्यों के फॉर्म में उन्हें अपने हस्ताक्षर की जगह अंगूठा लगाना पड़ता था, लेकिन अब उन्होंने हस्ताक्षर करना सीख लिया है। उन्होंने इतना अक्षर ज्ञान अर्जित कर लिया है कि वह पढ़ भी लेते हैं। वह जब पढ़ने साक्षरता केन्द्र मे जातें हैं तो अपने अनुभव को अन्य असाक्षर साथियों के साथ साझा करते हैं।
वह बताते हैं कि उनके समय में शिक्षा को लेकर इतनी जागरूकता नहीं थी लेकिन जो अवसर उन्हें बचपन में नहीं मिला आज राज्य शासन की योजना के द्वारा मिल रहा है। कनक यादव जी आज भी मजदूरी करते हैं लेकिन उम्र के इस पड़ाव में भी राज्य शासन के ‘‘पढ़ना लिखना’’ अभियान ने उनके जीवन में उजाला ला दिया है । उनके पढ़ने की ललक में ‘‘पढ़ना लिखना’’ अभियान का बहुत बड़ा योगदान है। वो अपने दोस्तों को ‘‘पढ़ना लिखना’’ अभियान के बारे में बताते हैं। वो बताते हैं कि ‘’आखर झाँपी’’ पुस्तक को उन्होंने सम्भाल कर रखा है, यह वह पुस्तक है जिसे वह शाम को पढ़ने के लिए ले जाते हैं। वो छोटे-छोटे बच्चो को भी बताते हैं कि मै पढ़ने जाता हूं।
कनक यादव ने ‘‘परीक्षा महा-अभियान’’ में भी पेपर दिया, जिसमें उन्होंने पूरे निर्धारित समय का उपयोग किया। ऐसा कहते हैं कि जो सीखना छोड़ देता है वो बूढा है, चाहे बीस का हो या अस्सी का, जो सीखता रहता है वो जवान रहता है। वर्तमान में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कनक यादव अब अंगूठा न लगाकर हस्ताक्षर करते हैं।
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