साल 2025 छत्तीसगढ़ के लिए उपलब्धियों के साथ-साथ गहरी भावनात्मक क्षति का वर्ष भी रहा। इस वर्ष प्रदेश ने ऐसे कई विशिष्ट व्यक्तित्वों को खो दिया, जिन्होंने हंसी, साहित्य, संगीत, राजनीति और पत्रकारिता के माध्यम से समाज को दिशा दी और पहचान दिलाई। हास्य कवि डॉ. सुरेंद्र दुबे, ज्ञानपीठ सम्मानित साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल, अभिनेत्री व गायिका सुलक्षणा पंडित, कांग्रेस नेता सुभाष धुप्पड़ और निर्भीक पत्रकार मुकेश चंद्राकर के निधन ने प्रदेश की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को अपूरणीय क्षति पहुंचाई।
पद्मश्री सम्मानित हास्य कवि डॉ. सुरेंद्र दुबे का 26 जून 2025 को निधन हो गया। बेमेतरा में जन्मे डॉ. दुबे ने हास्य को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक चिंतन का माध्यम बनाया। उनकी कविताएं मंचों पर ठहाके बिखेरते हुए जीवन की सच्चाइयों से रूबरू कराती थीं। आयुर्वेदिक चिकित्सक होने के साथ-साथ वे हिंदी और छत्तीसगढ़ी साहित्य की सशक्त आवाज थे, जिनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी।
साहित्य जगत को 23 दिसंबर 2025 को गहरा आघात तब लगा, जब ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल का निधन हुआ। ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ और ‘नौकर की कमीज’ जैसे कालजयी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने आम आदमी के जीवन को असाधारण संवेदना के साथ शब्द दिए। वे छत्तीसगढ़ के पहले ज्ञानपीठ सम्मानित लेखक थे, लेकिन उनकी भाषा और सोच हमेशा सरल और मानवीय बनी रही।
सिनेमा और संगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाली अभिनेत्री और गायिका सुलक्षणना पंडित का भी 2025 में निधन हो गया। रायगढ़ में जन्मी सुलक्षणा पंडित ने 70-80 के दशक की फिल्मों में अपनी सादगी और भावनात्मक अभिनय से दर्शकों के दिलों में जगह बनाई। “तू ही सागर है, तू ही किनारा” जैसे गीत आज भी उनकी मधुर आवाज की याद दिलाते हैं। निजी जीवन के संघर्षों के बावजूद कला के प्रति उनकी निष्ठा उन्हें खास बनाती है।
राजनीतिक क्षेत्र में कांग्रेस नेता सुभाष धुप्पड़ के निधन से रायपुर की राजनीति में एक शून्य उत्पन्न हुआ। वे संगठन से जुड़े जमीनी नेता थे, जिनका कार्यकर्ताओं से सीधा और सहज रिश्ता था। रायपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने शहर के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके जाने से राजनीति से ऊपर एक संवेदनशील और कर्मठ व्यक्तित्व की कमी महसूस की गई।
पत्रकारिता जगत के लिए 2025 की शुरुआत ही दुखद रही, जब युवा पत्रकार मुकेश चंद्राकर का असमय निधन हो गया। निर्भीक और सवाल पूछने वाली पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले मुकेश ने भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं को बेखौफ उजागर किया। उनका जाना यह याद दिलाता है कि सच की राह कितनी कठिन और जोखिम भरी होती है।
इन सभी विभूतियों का जाना छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक खालीपन छोड़ गया है। 2025 का यह अध्याय प्रदेश के लिए शोक और स्मृति का वर्ष बन गया, जहां इन चमकते सितारों की रौशनी अब उनके कार्यों और विचारों के रूप में हमेशा जीवित रहेगी।










