वह जो सभी इच्छाएं त्याग देता है
‘मैं’ और ‘मेरा’ की लालसा तथा
‘भावना’ से मुक्त हो जाता है
उसे शांति प्राप्त होती है।
जिस व्यक्ति में अहंकार मैं और मेरा का भाव समाप्त हो जाता है , कुछ पाने की लालसा नहीं होती। वह परम शांति को प्राप्त करता है, उसे भगवान ,ईश्वर की शरण प्राप्त होती है। अंत समय में वह उस परम पद को प्राप्त होता है ,जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।










