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Ekhabri खास खबर: बाघ दिवस पर विशेष – मध्यप्रदेश बना बाघ प्रदेश

भोपाल: रविवार, 28 जुलाई 2024। मध्यप्रदेश ने अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस के एक दिन पहले दुनिया को यह संदेश दिया कि यहां के लोगों को अपने बाघों पर गर्व है। राज्य में बाघों की संख्या 526 से बढ़कर 785 हो गई है, जो देश में सबसे अधिक है। यह वृद्धि 2010 में कुल 257 बाघों की संख्या से काफी ज्यादा है। 

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मध्यप्रदेश को ‘बाघ प्रदेश’ बनाने के पीछे वन विभाग के प्रयास और स्थानीय लोगों का सहयोग मुख्य कारण हैं। बाघों के संरक्षण के लिए 16 रीजनल रेस्क्यू स्क्वाड और विशेषज्ञ श्वान दलों का गठन किया गया है। इसके अलावा, वन्य प्राणी अपराधों की रोकथाम के लिए भी सख्त कदम उठाए गए हैं।

 

टाइगर रिजर्व में बसे छोटे-छोटे गांवों का वैज्ञानिक विस्थापन, ट्रांसलोकेशन, हैबिटेट विकास और सुरक्षा व्यवस्था में सुधार जैसे कदमों से बाघों की संख्या में वृद्धि हुई है। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व को यूनेस्को की विश्व धरोहर की संभावित सूची में शामिल किया गया है, और पेंच टाइगर रिजर्व को देश में सर्वोच्च रैंक मिली है।

 

मध्यप्रदेश ने टाइगर राज्य का दर्जा हासिल कर लिया है और राष्ट्रीय उद्यानों के बेहतर प्रबंधन में भी शीर्ष स्थान प्राप्त किया है। प्रदेश में तेंदुओं की संख्या भी सबसे अधिक है, जो देश की कुल संख्या का 25% है।

 

इस अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस पर, मध्यप्रदेश गर्व से अपने बाघों की रक्षा और संरक्षण के लिए किए गए प्रयासों को साझा कर रहा है।

 

ऐसे बना टाइगर स्टेट

 

 

बाघों की गणना हर 4 साल में एक बार होती है। वर्ष 2006 से बाघों की संख्या का आंकड़ा देखें तो वर्ष 2010 में बाघों की संख्या 257 तक हो गई थी। इसे बढ़ाने के लिए बाघों के उच्च स्तरीय संरक्षण और संवदेनशील प्रयासों की आवश्यकता थी। मध्यप्रदेश को बाघ प्रदेश बनाने की कड़ी मेहनत शुरु हुई।

 

मानव और वन्यप्राणी संघर्ष के प्रभावी प्रबंधन के लिए 16 रीजनल रेस्क्यू स्क्वाड और हर जिले में जिला स्तरीय रेस्क्यू स्क्वाड बनाए गए। वन्यप्राणी अपराधों की जांच के लिए वन्यप्राणी अपराध की खोज में विशेषज्ञ 16 श्वान दलों का गठन किया गया। अनाथ बाघ शावकों की रिवाल्विंग की गई है। विभिन्न प्रजातियां विशेष रूप से चीतल, गौर और बारहसिंगा का उन स्थानों पर पुनर्स्थापना किया गया, जहां वे संख्या में कम थे या स्थानीय तौर पर विलुप्त जैसे हो गए थे। राज्य स्तरीय स्ट्राइक फोर्स ने पिछले आठ वर्षों में वन्यप्राणी अपराध करने वाले 550 अपराधियों को 14 राज्यों से गिरफ्तार किया गया। इसमें से तीन विदेशी थे।

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संरक्षित क्षेत्र के बाहर वन्यप्राणी प्रबंधन के लिए बजट की व्यवस्था की गई। वन्य प्राणी पर्यटन से होने वाली आय की स्थानीय समुदाय के साथ साझेदारी की गई। इन सब प्रयासों के चलते बाघ संरक्षण के प्रयासों को मजबूती मिली।

 

बाघ प्रदेश बनने के कारण

 

मध्यप्रदेश के बाघ प्रदेश बनने के चार मुख्य पहलू है। पहला गांवो का वैज्ञानिक विस्थापन। वर्ष 2010 से 2022 तक टाइगर रिजर्व में बसे छोटे-छोटे 200 गांव को विस्थापित किया गया। सर्वाधिक 75 गांव सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से बाहर किए गए। दूसरा है ट्रांसलोकेशन। कान्हा के बारहसिंगा, बायसन और वाइल्ड बोर का ट्रांसलोकेशन कर दूसरे टाइगर रिजर्व में उन्हें बसाया गया। इससे बाघ के लिए भोजन आधार बढ़ा। तीसरा है हैबिटेट विकास। जंगल के बीच में जो गांव और खेत खाली हुए वहां घास के मैदान और तालाब विकसित किए गए जिससे शाकाहारी जानवरो की संख्या बढ़ी और बाघ के लिए आहार भी उपलब्ध हुआ। सुरक्षा व्यवस्था में अभूतपूर्व बदलाव हुआ। पन्ना टाईगर रिज़र्व में ड्रोन से सर्वेक्षण और निगरानी रखी गई। वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल कर अवैध शिकार को पूरी तरह से रोका गया। क्राइम इन्वेस्टीगेशन और पेट्रोलिंग में तकनीकी का इस्तेमाल बढ़ाया गया। इसका सबसे अच्छा उदाहरण पन्ना टाइगर रिजर्व है जिसका अपना ड्रोन स्क्वाड है। हर महीने इसके संचालन की मासिक कार्ययोजना तैयार की जाती है। इससे वन्य जीवों की लोकेशन खोजने, उनके बचाव करने, जंगल की आग का स्रोत पता लगाने और उसके प्रभाव की तत्काल जानकारी जुटाने, संभावित मानव और पशु संघर्ष के खतरे को टालने, वन्य जीव संरक्षण कानून का पालन करने में मदद मिल रही है।

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वन्यजीव सुरक्षा के कारण तेंदुओं की संख्या में भी मध्यप्रदेश देश में सबसे आगे है। देश में 12 हजार 852 तेंदुए हैं। अकेले मध्यप्रदेश में यह संख्या 4100 से ज्यादा है। देश में तेंदुओं की आबादी औसतन 60% बढ़ी है जबकि प्रदेश में यह 80% है। देश में तेंदुओं की संख्या का 25% अकेले मध्यप्रदेश में है।

 

राष्ट्रीय उद्यानों का बेहतर प्रबंधन

 

वर्ष 2010 में सेंट पीटर्सबर्ग बाघ सम्मेलन में बाघ की आबादी वाले 13 देशों ने वादा किया था कि वर्ष 2022 तक वे बाघों की आबादी दोगुनी कर देंगे। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में मध्यप्रदेश में बाघों के प्रबंधन में निरंतरता एवं उत्तरोत्तर सुधार हुए।

 

बाघों की संख्या में 33% की वृद्धि चक्रों के बीच अब तक की सबसे अधिक दर्ज की गई है जो 2006 से 2010 के बीच 21% और 2010 और 2014 के बीच 30% थी। बाघों की संख्या में वृद्धि, 2006 के बाद से बाघों की औसत वार्षिक वृद्धि दर के अनुरूप थी। मध्यप्रदेश में 526 बाघों की सबसे अधिक संख्या है। इसके बाद कर्नाटक में 524 बाघों की संख्या 442 बाघों के साथ उत्तराखंड तीसरे नंबर पर था। मध्यप्रदेश के लिए गर्व का विषय है कि वर्ष 2022 की समय-सीमा से काफी पहले यह उपलब्धि हासिल कर ली है।

 

प्रदेश में बाघों की संख्या बढ़ाने में राष्ट्रीय उदयानों के बेहतर प्रबंधन की मुख्य भूमिका है। राज्य शासन की सहायता से 50 से अधिक गाँवों का विस्थापन किया जाकर बहुत बड़ा भू-भाग जैविक दबाव से मुक्त कराया गया है। संरक्षित क्षेत्रों से गाँवों के विस्थापन के फलस्वरूप वन्य-प्राणियों के रहवास क्षेत्र का विस्तार हुआ है।

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कान्हा, पेंच, और कूनो पालपुर के कोर क्षेत्र से सभी गाँवों को विस्थापित किया जा चुका है। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व का 90 प्रतिशत से अधिक कोर क्षेत्र भी जैविक दबाव से मुक्त हो चुका है। विस्थापन के बाद घास विशेषज्ञों की मदद लेकर स्थानीय प्रजातियों के घास के मैदान विकसित किये जा रहे हैं इससे शाकाहारी वन्य-प्राणियों के लिये वर्ष भर चारा उपलब्ध होता रहे। इसके अतिरिक्त समस्त संरक्षित क्षेत्रों में रहवास विकास कार्यक्रम चलाया जा रहा है।

 

मध्यप्रदेश ने टाइगर राज्य का दर्जा हासिल करने के साथ ही राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों के प्रभावी प्रबंधन में भी देश में शीर्ष स्थान प्राप्त किया। सतपुडा टाइगर रिजर्व को यूनेस्को की विश्व धरोहर की संभावित सूची में शामिल किया गया है।

 

भारत सरकार की टाइगर रिज़र्व के प्रबंधन की प्रभावशीलता मूल्यांकन रिपोर्ट के अनुसार पेंच टाइगर रिजर्व ने देश में सर्वोच्च रैंक हासिल की है। बांधवगढ़, कान्हा, संजय और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व को सर्वश्रेष्ठ प्रबंधन वाले टाइगर रिजर्व माना गया है। इन राष्ट्रीय उद्यानों में अनुपम प्रबंधन योजनाओं और नवाचारी तरीकों को अपनाया गया है।

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