ये विचार सागर कितना विशाल है
ना जाने कब किसके लिए बना ये काल है
किसी के लिए अमृत है
तो किसी के लिए ये श्राप है
किसी में बसकर ये ऊंचाइयों तक पहुंचाता है.
किसी में रहकर ये नर्क कि गहराइयों
में ले जाता है
किसी को ये लोगों का चहेता बनाता है
तो किसी को पागलखानों के गालियारों तक पहुंचाता है
इस विचार सागर से बचकर रहना कहीं
ये तुमको उलझा ना ले
अपने पग संभलकर बढ़ाना
कहीं ये तुमको डुबा ना दे.










