देव उठने के साथ शादियों का सीजन शुरू हो चुका है। इस दौरान जीवन की नई शुरुआत करने वाले नव दंपतियों को ढेर सारी शुभकामनाएँ। अगले कुछ महीनों तक शहनाइयों की गूंज और शादियों की चमक-दमक हर जगह देखने को मिलेगी। कई लोग ऐसे होंगे जिनके घर शादी के न्योते आ चुके हैं या जिनके घर में शादी का आयोजन है। ईश्वर से यही कामना है कि सभी आयोजन हंसी-खुशी संपन्न हों।
आजकल बड़ी और महंगी शादियाँ करना एक चलन बन गया है। इसे व्यक्ति की प्रतिष्ठा से जोड़ा जाने लगा है। महँगी शादियाँ समाज में व्यक्ति की संपन्नता का प्रतीक मानी जाती हैं। शादियों की लंबी अवधि, छोटी-छोटी रस्मों के लिए बड़े आयोजन और हर रस्म के लिए अलग-अलग परिधान जैसे मेहंदी के लिए हरे कपड़े, हल्दी के लिए पीले कपड़े, और कॉकटेल पार्टियाँ, सभी जरूरी माने जाने लगे हैं।
इन आयोजनों का खर्च मेजबान के लिए ही नहीं बल्कि मेहमानों के लिए भी भारी साबित होता है। हर आयोजन के लिए खास परिधान और उपहार का खर्च मेहमानों पर भी बोझ डालता है। डेस्टिनेशन वेडिंग का चलन भी मशहूर हस्तियों के प्रभाव से बढ़ा है। इसमें दूर-दराज के स्थलों पर चुनिंदा मेहमानों को आमंत्रित किया जाता है, जो मेजबान और मेहमान दोनों के लिए आर्थिक दबाव का कारण बनता है।
शादियों में अब कई तरह के पकवानों का प्रदर्शन आम हो गया है। अलग-अलग स्टॉल्स, मुख्य व्यंजन, और मिठाइयाँ तैयार की जाती हैं। इससे खाने की बर्बादी होती है, क्योंकि लोग शौक में अधिक खाना ले लेते हैं और न खा पाने पर वह खाना व्यर्थ जाता है।
शादियों के नए-नए ट्रेंड ने इन्हें खर्चीला बना दिया है। यह आम आदमी के लिए चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। गरीब तबका, जो अपनी बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं कर पाता, ऐसी शादियों की कल्पना भी नहीं कर सकता। इसके चलते कई बार लोग अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए कर्ज लेते हैं और एक नई मुसीबत में फंस जाते हैं।
सोचने वाली बात यह है कि क्या इन महंगे आयोजनों के बिना शादी का आयोजन नहीं हो सकता? ऐसे आयोजन न सिर्फ आर्थिक बोझ बनते हैं बल्कि समाज में गलत उदाहरण भी पेश करते हैं। शादी को रिश्तों की मिठास और पारिवारिक मेल-जोल का अवसर बनाएँ, न कि फिजूलखर्ची और दिखावे का माध्यम।
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