बड़ो की छत्रछाया हमारी संस्कृति और संस्कार है।
“बोझ नही” यह हमारा सुरक्षा कवच है। इन्हे सम्भाल कर रखिये बदन मेरा मिट्टी का साँसे मेरी उधार है।घमंड करो तो किस बात का हम सब उसके ही तो किराएदार है।
घर के बड़े वो बरगद के पेड़ के समान हैं जो धूप पानी आंधी को झेल कर अपनी शाखाओं को सुरक्षित रखते हैं। अपने छाव की मीठी ठंडकता देते हैं। उनका खुद का कोई स्वार्थ नहीं होता वो हमेशा अपनो के लिए जीते हैं।










