पानी को कितना भी गर्म कर लें
पर वह थोड़ी देर बाद अपने मूल स्वभाव में आकर शीतल हो जाता हैं।
इसी प्रकार हम कितने भी क्रोध में, भय में, अशांति में रह लें,
थोड़ी देर बाद बोध में, निर्भयता में और प्रसन्नता में हमें आना ही होगा क्योंकि यही हमारा मूल स्वभाव है।
जिस दिन हम ये समझ जायेंगे कि सामने वाला गलत नहीं है सिर्फ उसकी सोच हमसे अलग है उस दिन जीवन से दुःख समाप्त हो जायेंगे “बड़प्पन” वह गुण है जो पद से नहीं “संस्कारों” से प्राप्त होता है।










