Google Analytics Meta Pixel हरियाली अमावस्या के दिन पितरों को दें तर्पण मिलेगी संतुष्टि, जानिए तर्पण का सही समय - Ekhabri.com

हरियाली अमावस्या के दिन पितरों को दें तर्पण मिलेगी संतुष्टि, जानिए तर्पण का सही समय

रायपुर। 12 अगस्‍त को हरियाली अमावस्‍या है। अमावस्‍या के दिन पितरों को जल अर्पित करना बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। इसे पितृ तर्पण कहा जाता है। माना जाता है कि पितरों को श्रद्धा और भक्ति भाव से जल देने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। पितर तृप्त भी होते है।

धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, पितरों को जल देने का सर्वोत्तम समय सूर्योदय के बाद और दोपहर से पहले का माना गया है। इस समय किया गया तर्पण शुभ फल देने वाला माना जाता है। इसे पितरों को जल अर्पित करने का उत्तम समय कहा गया है।

 

जल देने का सही समय

पितरों को जल देने के लिए सबसे अच्छा समय सुबह का होता है। सूर्योदय होने के बाद से लेकर दोपहर 12 बजे तक का समय तर्पण के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त पर पितरों को जल अर्पित करने से उनका आशीर्वाद मिलता है। इसलिए विशेष रूप से प्रातः 11 से दोपहर 12 बजे तक का समय पितरों को तर्पण देने के लिए शुभ माना जाता है।

 

हालांकि, यदि आप किसी पवित्र नदी में स्‍नान के बाद पितरों को तर्पण दे रहे हैं, तो सुबह के शांत और सात्विक समय को सबसे अच्‍छा माना गया है। इस समय किया गया तर्पण अधिक प्रभावशाली माना जाता है। इस वक्‍त हम अपने पितरों से दिल से जुड़ाव महसूस करते हैं। श्रद्धा और नियम के साथ किया गया जल अर्पण पितरों तक शीघ्र पहुंचता है, ऐसी धार्मिक मान्यता है।

 

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इस समय नहीं दें जल

पितरों को जल अर्पित करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए।

सूर्यास्त के बाद न दें पितरों को तर्पण।

रात के समय में पितरों को जल अर्पित करने का नहीं मिलता है फल।

बिना स्नान किए पितरों को कभी न दें तर्पण ।

अशुद्ध अवस्था में पितरों को कभी भी तर्पण न दें।

पितरों को जल देने की विधि

पितरों को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके जल अर्पित करना चाहिए, इसलिए सबसे पहले एक साफ स्‍थान तलाश लें और वहां पर इस दिशा में मुख करके खड़े हो जाएं।

पितरों को जो जल अर्पित करने जा रही हैं, उसमें तिल, कुशा और फूल मिलाकर अर्पित करें।

जल देते समय पितरों का स्मरण करें और उनके प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान का भाव रखें।

जल को हाथों की अंजलि से धीरे-धीरे धरती पर प्रवाहित करें।

इस दौरान पितरों की शांति और उनके आशीर्वाद की कामना करनी चाहिए।

अतः पितरों को जल देना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम है।

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