कोरोना महामारी से निपटने के लिए जिन दवाओं की जरूरत है, उनके कच्चे माल के लिए भारत चीन पर ही निर्भर है। भारत भले ही आकार के हिसाब से दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा दवा उत्पादक देश है, लेकिन आवश्यक दवाओं का उत्पादन कच्चे माल की कमी सबसे बडा संकट है। नतीजा यह है कि दूसरी लहर के बीच आवश्यक दवाओं की कमी ने सरकार से लेकर मरीजों तक की चिंता बढ़ा दी है। दवाएं इसलिए महंगी मिल रही हैं, क्योंकि कच्चा माल नहीं है। भारत के लिए 85 प्रतिशत कच्चा माल चीन से आता है, केवल 15 प्रतिशत ही देश में बनता है।
चीन से आने वाला यह कच्चा माल एक्टिव फार्मास्युटिकल इन्ग्रेडिएंट (एपीआइ) के नाम से जाना जाता है। इसे मनुष्य निर्मित रसायन या मॉलीक्यूल कहा जाता है। जैसे क्रोसीन का एपीआइ पैरासीटामोल है। बीते कुछ माह में जीवन रक्षक दवाओं में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के दाम कई गुना बढ़े हैं। बढ़ती मांग के जवाब में 50 फीसद माल भी चीन से नहीं मिल रहा है। कोरोना उपचार के दौरान इस्तेमाल हो रही दवाओं के कच्चे माल की मांग ही सबसे अधिक बढ़ी है।
इसकी सबसे बडी वजह यह है कि चीन ने इतनी सस्ती दरों पर सामान देना शुरू कर दिया कि भारतीय उद्योग यहां कच्चा माल बना कर भी चीन वाली कीमत पर नहीं दे पा रहे थे। 10 साल पहले तक भारत में ही एपीआइ बनते थे। चीन में मशीनें भी अत्याधुनिक हैं, इसलिए वह सस्ते में सामान बना और बेच कर मुनाफा कमाता है। भारत सरकार की अनुमति के बाद चीन ने बेहद सस्ते दर पर भारतीय दवा उद्योगों को एपीआइ मुहैया करवाए। इसके बाद भारतीय बाजार पर चीनी कंपनियों का एकाधिकार हो गया।
जनवरी 2020 में भारत में कोरोना की दस्तक के साथ ही एपीआइ का संकट पैदा हुआ और भारत ने बल्क ड्रग पार्क बनाए जाने की दिशा में प्रयास शुरू किया। बल्क ड्रग पार्क यानी जहां बड़े स्तर पर दवाओं के लिए कच्चे माल का उत्पादन होता है। एक बल्क ड्रग पार्क ऊना में हो, इसके लिए प्रयास जारी हैं, लेकिन अब तक धरातल पर कुछ नहीं है।
देश के फार्मा हब बीबीएन (बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़) में 650 दवा कंपनियां हैं, जो देश और विदेश में भी दवा आपूर्ति करती हैं। इनमें से अधिकांश के लिए कच्चा माल चीन से आता है। चीन ने बीते दिनों भारत के लिए विमान सेवाएं बंद कर दी थीं, नतीजतन दो सप्ताह तक एपीआइ की आपूर्ति बंद रही।
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