रायपुर। छत्तीसगढ़ में कृषि अवशेष, वन संसाधन, पशुधन अपशिष्ट और नगरीय जैव अपशिष्ट को स्वच्छ ऊर्जा में बदलकर ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रोजगार और आय के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। कम्प्रेस्ड बायोगैस, ग्रीन हाइड्रोजन, बायोएथेनॉल और अन्य जैव ईंधनों के क्षेत्र में उपलब्ध संभावनाओं का योजनाबद्ध उपयोग राज्य को देश की उभरती जैव ऊर्जा अर्थव्यवस्था में अग्रणी भूमिका दिला सकता है।
इन्हीं संभावनाओं और भविष्य की कार्ययोजना पर चर्चा के लिए छत्तीसगढ़ राज्य जलवायु परिवर्तन केंद्र, इसके तकनीकी साझेदार सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड एनर्जी डेवलपमेंट (सीड) तथा छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल विकास प्राधिकरण के संयुक्त तत्वावधान में अरण्य भवन, नवा रायपुर अटल नगर में कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला का मुख्य विषय ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास में जैव ऊर्जा की भूमिका रहा।
कार्यशाला में शासन के विभिन्न विभागों, सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के उद्योगों, वित्तीय और तकनीकी संस्थानों, शिक्षाविदों तथा नागरिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने जैव ऊर्जा क्षेत्र की संभावनाओं, चुनौतियों और भविष्य की रणनीति पर मंथन किया। विशेषज्ञों ने कहा कि राज्य में उपलब्ध बायोमास संसाधनों की मजबूत वैल्यू चेन विकसित कर उन्हें स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन से जोड़ने से जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होगी। साथ ही उद्योगों के डीकार्बोनाइजेशन, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण रोजगार को भी गति मिलेगी।
कम्प्रेस्ड बायोगैस नीति-2026 से जैव ऊर्जा क्षेत्र को नई दिशा
कार्यशाला में बताया गया कि राज्य सरकार ने जैव ऊर्जा क्षेत्र की संभावनाओं को देखते हुए छत्तीसगढ़ कम्प्रेस्ड बायोगैस नीति-2026 लागू की है। इस नीति को स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन, हरित औद्योगिकीकरण, कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के विस्तार और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
इसके अलावा छत्तीसगढ़ औद्योगिक विकास नीति 2024-30 में बायोएनर्जी परियोजनाओं के लिए विभिन्न प्रोत्साहनों और सुविधाओं का प्रावधान किया गया है। इन नीतिगत पहलों के माध्यम से जैव ऊर्जा परियोजनाओं के लिए अनुकूल निवेश वातावरण तैयार करने और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
विशेषज्ञों ने कहा कि जैव ऊर्जा का विस्तार केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है। इससे कृषि अवशेषों और अपशिष्ट का आर्थिक उपयोग संभव होगा, किसानों को अतिरिक्त आय मिलेगी, स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बनेंगे और सर्कुलर इकोनॉमी को मजबूती मिलेगी।
बायोमास को अपशिष्ट नहीं, आर्थिक संसाधन के रूप में विकसित करने पर जोर
छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल विकास प्राधिकरण के मुख्य कार्यपालन अधिकारी सुमित सरकार ने कहा कि ऊर्जा सुरक्षा के साथ सामाजिक और पर्यावरणीय विकास के लक्ष्यों को एक साथ हासिल किया जा सकता है। इसके लिए बायोमास को केवल कृषि अवशेष या अपशिष्ट के रूप में देखने के बजाय ऊर्जा आधारित आर्थिक विकास और हरित रोजगार के महत्वपूर्ण संसाधन के रूप में विकसित करने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि कम्प्रेस्ड बायोगैस, बायोएथेनॉल और अन्य बायोफ्यूल जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इनके उपयोग से उद्योगों के कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के साथ संसाधनों के पुनः उपयोग पर आधारित सर्कुलर इकोनॉमी को भी मजबूती मिलेगी।
उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की कृषि और वन आधारित अर्थव्यवस्था जैव ऊर्जा के विकास के लिए मजबूत आधार उपलब्ध कराती है। उपलब्ध संसाधनों को तकनीक, निवेश और प्रभावी बाजार व्यवस्था से जोड़कर प्रदेश में जैव ऊर्जा आधारित नए आर्थिक अवसर विकसित किए जा सकते हैं।
क्लस्टर मॉडल से घटेगी लागत, किसानों और स्थानीय समुदायों की बढ़ेगी आय
वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के सीसीएफ, एचआरडी-आईटी आलोक तिवारी ने कहा कि राज्य में कृषि फसलों, वन एवं पशुधन संसाधनों तथा नगरीय निकायों से निकलने वाले जैव अपशिष्ट की पर्याप्त उपलब्धता को देखते हुए क्लस्टर आधारित मॉडल जैव ऊर्जा के विकास में प्रभावी हो सकता है।
उन्होंने कहा कि क्लस्टर आधारित व्यवस्था से बायोमास के परिवहन की लागत कम की जा सकती है और जैव ऊर्जा संयंत्रों के लिए फीडस्टॉक की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है। इसके माध्यम से किसान उत्पादक संगठनों, स्व-सहायता समूहों और स्थानीय समुदायों को आर्थिक गतिविधियों से जोड़कर उनकी आय बढ़ाने के अवसर भी मिलेंगे।
विभागों और संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय जरूरी
सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड एनर्जी डेवलपमेंट (सीड) के मुख्य कार्यपालन अधिकारी रमापति कुमार ने कहा कि छत्तीसगढ़ की बायोएनर्जी क्षमता को जमीन पर उतारने के लिए कृषि, ग्रामीण विकास, ऊर्जा, उद्योग, पर्यावरण और वित्त विभागों के साथ छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल विकास प्राधिकरण, छत्तीसगढ़ राज्य अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण और अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।
उन्होंने कहा कि उद्योगों, वित्तीय संस्थानों, किसानों और नागरिक संगठनों को भी इस प्रक्रिया से जोड़ना होगा। प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता और दीर्घकालिक नीतिगत पहलों के माध्यम से छत्तीसगढ़ को बायोएनर्जी के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल किया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि सीड राज्य के प्रयासों में सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है और फीडस्टॉक प्रबंधन, बायोमास वैल्यू चेन तथा नवीन समाधानों की दिशा में लगातार कार्य कर रहा है।
कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ स्टेट बायोडायवर्सिटी बोर्ड के सदस्य-सचिव अमिताभ वाजपेयी भी शामिल हुए।
फीडस्टॉक से बाजार तक पूरी वैल्यू चेन पर हुआ मंथन
कार्यशाला के तकनीकी सत्रों में जैव ऊर्जा उत्पादन के लिए कच्चे माल की उपलब्धता, फीडस्टॉक प्रबंधन, परिवहन, संग्रहण, तकनीक, बाजार, वित्तपोषण और उद्योगों में जैव ईंधन के उपयोग जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई।
तकनीकी सत्र में भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड के जनरल मैनेजर-बायोफ्यूल संतोष वार्ष्णेय, सीनियर मैनेजर-कृषि, बरगढ़ डॉ. प्रवीण डी. चेंडगे, रायपुर नगर निगम के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर एवं स्वच्छ भारत मिशन के नोडल अधिकारी योगेश कुमार काडू, छत्तीसगढ़ राज्य जलवायु परिवर्तन केंद्र के प्रोजेक्ट साइंटिस्ट डॉ. अनिल श्रीवास्तव, एनर्जी कोर इंडिया एंड पावर लिमिटेड के डायरेक्टर विशाल प्रसाद गुप्ता, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के चंद्रमौली सिंह, जिंदल पावर लिमिटेड तमनार के विशाल जाधव, सेक्टर एक्सपर्ट पुलकित श्रोत्रय, सीड के डायरेक्टर-जस्ट ट्रांजिशन अश्वनी अशोक, एसोसिएट डायरेक्टर-क्लाइमेट डॉ. देवयानी शर्मा और तुषार शर्मा सहित विभिन्न विशेषज्ञों ने विचार रखे।
सरकार, उद्योग और शिक्षाविदों ने साझा की रणनीति
कार्यशाला में कृषि, वन एवं जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा, स्टेट अर्बन डेवलपमेंट एजेंसी और रायपुर नगर निगम के अधिकारियों ने भाग लिया। महिन्द्रा पावर, जायसवाल नेको, नाकोडा इस्पात, गोदावरी तथा बायोएनर्जी और सीएनजी आधारित विभिन्न उद्योगों के प्रतिनिधि भी चर्चा में शामिल हुए।
आईआईएम रायपुर और कलिंगा यूनिवर्सिटी के शिक्षाविदों तथा विभिन्न सिविल सोसाइटी संगठनों के प्रतिनिधियों ने जैव ऊर्जा के विकास से जुड़े तकनीकी, आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक पहलुओं पर सुझाव दिए।
बायोमास कॉरिडोर और मजबूत फीडस्टॉक नेटवर्क की जरूरत
कार्यशाला में राज्य के जैव ऊर्जा क्षेत्र को गति देने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए। विशेषज्ञों ने उपलब्ध बायोमास संसाधनों का मानकीकृत आकलन कर विश्वसनीय डेटाबेस तैयार करने की जरूरत बताई। इसके साथ ही एकीकृत बायोमास कॉरिडोर विकसित करने, संग्रहण एवं एकत्रीकरण की मजबूत व्यवस्था बनाने और उत्पादों की बाजार तक सुगम पहुंच सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया।
निजी निवेश आकर्षित करने के लिए अनुकूल वित्तीय और नियामकीय व्यवस्था विकसित करने तथा फीडस्टॉक के संग्रहण और प्रबंधन में किसान उत्पादक संगठनों, स्व-सहायता समूहों और सहकारी समितियों की भूमिका बढ़ाने की आवश्यकता भी रेखांकित की गई।
विशेषज्ञों ने कहा कि नीति, तकनीक, निवेश और स्थानीय समुदायों को एक साझा मंच पर लाकर छत्तीसगढ़ में बायो-रिसोर्स आधारित अर्थव्यवस्था का मजबूत इकोसिस्टम विकसित किया जा सकता है। इससे कृषि और वन आधारित संसाधनों का बेहतर मूल्य संवर्धन होगा और किसानों तथा ग्रामीण समुदायों के लिए अतिरिक्त आय, स्थानीय स्तर पर हरित रोजगार और उद्योगों के लिए स्वच्छ ऊर्जा के नए विकल्प उपलब्ध होंगे।
राज्य में उपलब्ध प्राकृतिक और जैव संसाधनों के वैज्ञानिक एवं सतत उपयोग के माध्यम से ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास को एक साथ आगे बढ़ाने की दिशा में यह कार्यशाला महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रभावी नीति, निजी निवेश, मजबूत फीडस्टॉक नेटवर्क और स्थानीय समुदायों की भागीदारी के साथ छत्तीसगढ़ देश के प्रमुख बायोएनर्जी राज्यों में अपनी मजबूत पहचान बना सकता है।










