गुजरात के सूरत में नौ साल की देवांशी ने संन्यास ग्रहण किया है। वह हीरा कारोबारी संघवी मोहन भाई की पोती और धनेश-अमी बेन की बेटी हैं। उन्होंने जैनाचार्य कीर्तियशसूरीश्वर महाराज से दीक्षा प्राप्त की है। देवांशी का दीक्षा महोत्सव 14 जनवरी 2023 को शुरू हुआ था। बुधवार (18 जनवरी 2023) को पूरा हुआ। देवांशी के संन्यास लेने से पहले दीक्षा महोत्सव के अवसर पर सूरत में वर्षीदान यात्रा निकाली गई थी। इसमें करीब 35 हजार लोग शामिल हुए। देवांशी की दीक्षा दान यात्रा नवंबर 2022 में बेल्जियम में निकाली गई थी।
सूरत वेसू के बलर फार्म में चल रहे दीक्षा महोत् व के पांचवें दिन देवांशी ने अपने परिवार की मौजूदगी में सांसारिक माया व मोह का त्याग कर दीक्षा लेकर जैन साध्वी बन गई। बचपन से ही उसका झुकाव धर्म व अध्यात्म की ओर था। पालीताणा में उसने पहला उपवास किया तथा तीन खमासना भी किये। शिखर जी में हुए अंजन शाखा महोत्सव में अंजना बनीं। उन्होंने सात साल की उम्र में आठ दिन का कठोर देसावगासिक और पौषध तप भी किया।
देवांशी के पिता सूरत के एक नामी हीरा कारोबारी है, वे डायमंड पालिशिंग और निर्यात फर्म संघवी एंड संस के मालिक हैं। दीक्षा समारोह पिछले शनिवार से शुरू हुआ। देवांशी ने अब उन सभी भौतिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया जो उसे हीरा कारोबारी पिता के परिवार से मिल रही थीं। पिता धनेश संघवी का परिवार मूलरूप से राजस्थान के सिरोही जिले की रेवदर तहसील के मालगांव का रहने वाला है। इनका 100 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार है। धनेश ने कहा कि देवांशी ने कभी टीवी नहीं देखा, जैन धर्म में वर्जित वस्तुओं का कभी उपयोग नहीं किया और रेस्त्रां में खाना भी नहीं खाती थी। जैन धर्म के आचार विचारों का बचपन से पालन करती थी।
पारिवारिक मित्र नीरव शाह बताते हैं कि देवांशी का झुकाव बहुत कम उम्र से ही आध्यात्मिक जीवन की ओर था और उन्होंने अन्य भिक्षुओं के साथ लगभग 700 किमी की पैदल यात्रा कर चुकी हैं। औपचारिक रूप से साध्वी बनने से पहले ही उसने संन्यास का मार्ग अपना लिया था। वह पांच भाषाओं की जानकार हैं तथा बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। संघवी परिवार की दो पुत्रियों में देवांशी बड़ी है उसके एक चार साल की छोटी बहन है। देवांशी को जैन समुदाय से जुड़े वैराग्य शतक और तत्वार्थ के अध्याय जैसे महाग्रंथ कंठस्थ हैं।
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