छत्तीसगढ़ सरकार प्रदेश के पांच प्रमुख शक्तिपीठों को विकसित कर धार्मिक पर्यटन को नई पहचान देने की दिशा में काम कर रही है। छत्तीसगढ़ आस्था पथ योजना के तहत मां महामाया मंदिर रतनपुर, मां बम्लेश्वरी मंदिर डोंगरगढ़, मां दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा, मां बागेश्वरी मंदिर कुदरगढ़ और मां चंद्रहासिनी मंदिर चंद्रपुर को धार्मिक पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित करने की योजना है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में इस पहल के लिए 5 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। परियोजना का उद्देश्य श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ प्रदेश की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना है।

करीब 1,000 किलोमीटर का धार्मिक पर्यटन कॉरिडोर
छत्तीसगढ़ प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक धरोहरों और धार्मिक आस्था के लिए जाना जाता है। राज्य में लगभग 138 स्थलों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय महत्व के आधार पर पर्यटन विकास के लिए प्राथमिकता दी गई है। इनमें ऐतिहासिक स्मारक, अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान भी शामिल हैं। राज्य की सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक परंपराएं पर्यटन की अपार संभावनाएं प्रस्तुत करती हैं।
इसी संभावना को ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने उत्तराखंड के चारधाम की तर्ज पर प्रमुख धार्मिक स्थलों को जोड़ने की पहल की है। शक्तिपीठ परियोजना के तहत लगभग 1,000 किलोमीटर लंबे आध्यात्मिक एवं धार्मिक पर्यटन कॉरिडोर के विकास की परिकल्पना की गई है। इसके अंतर्गत मंदिरों तक पहुंचने वाले मार्गों को बेहतर बनाने, श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने और धार्मिक स्थलों के सौंदर्यीकरण पर जोर दिया जा रहा है।
पांच शक्तिपीठों को मिलेंगी आधुनिक सुविधाएं
परियोजना के अंतर्गत पांचों शक्तिपीठों में बेहतर सड़क संपर्क, स्वच्छ पेयजल, प्रकाश व्यवस्था, आधुनिक शौचालय, पार्किंग, बैठने की व्यवस्था, विश्राम स्थल और सुरक्षा सुविधाओं को विकसित करने की योजना है। इसके अलावा बगीचे, हवन-पूजन स्थल, रेलिंग, सीसीटीवी कैमरे, पर्यटक सहायता केंद्र, डिजिटल सूचना प्रणाली, प्राथमिक चिकित्सा केंद्र और होम स्टे जैसी सुविधाओं पर भी ध्यान दिया जाएगा।

स्थानीय परिस्थितियों और पर्यटन की संभावनाओं के अनुसार रोप-वे सहित अन्य सुविधाओं के विकास पर भी विचार किया जा सकता है। इन स्थलों के विकास में स्थानीय वास्तुकला, सांस्कृतिक परंपराओं और प्राकृतिक परिवेश के संरक्षण को महत्व देने की योजना है। इससे श्रद्धालुओं को सुविधाजनक दर्शन के साथ क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ने का अवसर मिलेगा।
मां महामाया मंदिर रतनपुर के लिए 200 करोड़ की कार्ययोजना
बिलासपुर जिले के रतनपुर स्थित मां महामाया मंदिर के समग्र विकास के लिए केंद्र सरकार की तीर्थयात्रा कायाकल्प एवं आध्यात्मिक संवर्धन अभियान (प्रसाद) योजना के अंतर्गत 200 करोड़ रुपये की कार्ययोजना तैयार कर पर्यटन मंत्रालय को भेजी गई है। प्रस्ताव को स्वीकृति मिलने के बाद संबंधित एजेंसी निर्धारित कर विकास कार्य शुरू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।

मां महामाया मंदिर छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। मंदिर का इतिहास कलचुरी काल से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि कलचुरी राजा रत्नदेव प्रथम ने 11वीं-12वीं शताब्दी के दौरान इस मंदिर का निर्माण कराया था। मां महामाया को दक्षिण कोशल क्षेत्र की आराध्य देवी और रतनपुर राज्य की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है।
डोंगरगढ़, कुदरगढ़, चंद्रपुर और दंतेवाड़ा स्थित शक्तिपीठों के विकास के लिए भी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया चल रही है। इन योजनाओं के माध्यम से धार्मिक पर्यटन को व्यवस्थित स्वरूप देने और श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं का विस्तार करने का लक्ष्य है।
मां बम्लेश्वरी मंदिर डोंगरगढ़: आस्था का प्रमुख केंद्र
राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ में पहाड़ी पर स्थित मां बम्लेश्वरी मंदिर छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। समुद्र तल से लगभग 1,600 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर में वर्षभर श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। विशेष रूप से नवरात्र के दौरान यहां बड़ी संख्या में भक्तों का आगमन होता है।
मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में इस क्षेत्र को कामाख्या नगरी के नाम से जाना जाता था। राजा वीरसेन द्वारा संतान प्राप्ति के लिए भगवान शिव और देवी दुर्गा की आराधना किए जाने तथा देवी की कृपा से पुत्र प्राप्त होने की कथा प्रचलित है। मंदिर का इतिहास प्राचीन धार्मिक परंपराओं और क्षेत्रीय राजवंशों से जुड़ा हुआ माना जाता है।
डोंगरगढ़ का प्राकृतिक परिवेश और पहाड़ी पर स्थित मंदिर श्रद्धालुओं के साथ पर्यटकों को भी आकर्षित करता है। बेहतर यात्री सुविधाओं, आवागमन और सुरक्षा व्यवस्था के विकास से यहां धार्मिक पर्यटन को और बढ़ावा मिलने की संभावना है।
मां महामाया मंदिर रतनपुर: कलचुरी काल की ऐतिहासिक विरासत
बिलासपुर जिले के रतनपुर में स्थित मां महामाया मंदिर छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध सिद्ध शक्तिपीठों में गिना जाता है। यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व भी रखता है। इसे कलचुरी राजवंश की परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है।
मंदिर के गर्भगृह में मां महामाया की प्रतिमा स्थापित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां माता सती का दाहिना हाथ गिरा था। नवरात्र सहित विभिन्न पर्वों पर मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
मंदिर के समग्र विकास के लिए तैयार की गई 200 करोड़ रुपये की प्रस्तावित कार्ययोजना को स्वीकृति मिलने पर यहां पर्यटन सुविधाओं, परिसर के विकास और श्रद्धालुओं के अनुभव को बेहतर बनाने की दिशा में काम आगे बढ़ सकता है।
मां दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा: आदिवासी संस्कृति और सनातन आस्था का संगम
बस्तर अंचल के दंतेवाड़ा में स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर धार्मिक आस्था और आदिवासी संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र है। मंदिर शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम क्षेत्र के निकट स्थित है। स्थानीय परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं में इस मंदिर का विशेष स्थान है।
मान्यता है कि यहां माता सती का दांत गिरा था, जिसके कारण देवी का नाम दंतेश्वरी पड़ा। मंदिर को बस्तर के काकतीय राजवंश की कुलदेवी की परंपरा से भी जोड़ा जाता है। यहां स्थापित देवी की प्रतिमा श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है।
विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा के दौरान मां दंतेश्वरी की पूजा और उनसे जुड़ी परंपराएं विशेष महत्व रखती हैं। इस अवसर पर देवी के छत्र और डोली से जुड़ी धार्मिक रस्मों में बड़ी संख्या में स्थानीय आदिवासी समुदाय और श्रद्धालु भाग लेते हैं। मंदिर का विकास बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
मां बागेश्वरी मंदिर कुदरगढ़: पहाड़ियों और जंगलों के बीच आस्था
सूरजपुर जिले के ओड़गी विकासखंड में स्थित मां बागेश्वरी मंदिर कुदरगढ़ धाम के नाम से प्रसिद्ध है। पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर चारों ओर से घने जंगलों और प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा हुआ है। स्थानीय मान्यताओं में मां बागेश्वरी को शक्ति, साहस और रक्षक देवी के रूप में पूजा जाता है।
प्रचलित कथाओं के अनुसार, कुदरगढ़ क्षेत्र देवी की तपोस्थली रहा है। मंदिर की स्थापना और पूजा परंपराओं को लेकर स्थानीय राजवंशों तथा आदिवासी समुदायों से जुड़ी मान्यताएं प्रचलित हैं। यहां बैगा समुदाय की धार्मिक परंपराओं का भी महत्वपूर्ण स्थान है।
नवरात्र के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में स्थित होने के कारण बेहतर पहुंच मार्ग, पेयजल, विश्राम और सुरक्षा सुविधाओं का विकास यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।
मां चंद्रहासिनी मंदिर चंद्रपुर: महानदी तट पर स्थित प्रसिद्ध धाम
सक्ती जिले के चंद्रपुर में महानदी के तट के निकट स्थित मां चंद्रहासिनी मंदिर छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में शामिल है। महानदी और मांड नदी के संगम क्षेत्र के निकट स्थित यह मंदिर अपनी धार्मिक मान्यताओं, ऐतिहासिक परंपराओं और प्राकृतिक परिवेश के लिए जाना जाता है।
प्रचलित मान्यता के अनुसार, मंदिर का नाम राजा चंद्रहास से जुड़ा हुआ है। स्थानीय धार्मिक परंपराओं में मां चंद्रहासिनी को शक्तिस्वरूपा देवी के रूप में पूजा जाता है। नवरात्र सहित विभिन्न अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में यात्री सुविधाओं, स्वच्छता, प्रकाश व्यवस्था, पार्किंग तथा आवागमन को बेहतर बनाने से धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिल सकता है। शक्तिपीठ सर्किट में शामिल होने से चंद्रपुर को प्रदेश के अन्य प्रमुख धार्मिक स्थलों के साथ जोड़ने की योजना को गति मिलने की उम्मीद है।
धार्मिक पर्यटन से रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा बढ़ावा
छत्तीसगढ़ शक्तिपीठ परियोजना का उद्देश्य केवल मंदिरों का सौंदर्यीकरण करना नहीं, बल्कि धार्मिक पर्यटन को राज्य की अर्थव्यवस्था से जोड़ना भी है। बेहतर आधारभूत सुविधाओं और सड़क संपर्क से श्रद्धालुओं तथा पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने की संभावना है। इससे स्थानीय परिवहन, होटल, भोजनालय, होम स्टे, हस्तशिल्प और अन्य छोटे व्यवसायों को लाभ मिल सकता है।
पर्यटन विकास में स्थानीय समुदायों की भागीदारी, सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों का संवहनीय उपयोग भी महत्वपूर्ण होगा। निजी निवेश को प्रोत्साहित करने, पर्यटन से संबंधित आधारभूत संरचना विकसित करने और नए पर्यटन अनुभवों को बढ़ावा देने से रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
पांच प्रमुख शक्तिपीठों को धार्मिक पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित करने की पहल छत्तीसगढ़ की आध्यात्मिक पहचान को व्यापक स्तर पर स्थापित करने का अवसर प्रदान करती है। प्रस्तावित योजनाओं और बजटीय प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन होने पर प्रदेश धार्मिक पर्यटन के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर सकता है।










