विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ जी की रथयात्रा पर्व के ठीक 8 बाद देवशयनी एकादशी आती है।
इस एकादशी को पद्मा एकादशी , लक्ष्मीनारायण एकादशी , आषाढ़ी एकादशी और हरिशयनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। देवशयनी एकादशी से चार माह तक भगवान विष्णु क्षीरसागर में विश्राम करते हैं। इस समय को चार्तुमास / चौमासा भी कहा जाता है। इसलिये विवाह , सगाई , लगनपुजा आदि मांगलिक कार्य वर्जित रहता है।
देवशयनी के शुरू होने के साथ ही इन 4 माह में पृथ्वी लोक का भार भगवान भोलेनाथ व उनके परिवार के ऊपर आ जाता है।
इसलिए देवशयनी के तुरंत बाद भगवान शिव व उनके परिवार गणों का पूजन आरम्भ हो जाता है। सावन भर शिव जी की पूजा ,
नागपंचमी को नाग पूजा,
पोला को नन्दी बैल की पूजा,
तीजा को शिव पार्वती पूजा ,
भादो में गणेश जी का ,
क्वार के प्रथम पक्ष में पितर पूजा,
दूसरे पक्ष में देवी जी की पूजा,
शरदपूर्णिमा में चंद्रमा की पूजा
देवशयनी एकादशी व्रत का धार्मिक महत्व
भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी, तब दो पग में पृथ्वी और स्वर्ग को श्री हरि ने नाप दिया और जब तीसरा पग रखने लगे तब बलि ने अपना सिर आगे रख दिया। भगवान विष्णु ने राजा बलि से प्रसन्न होकर उनको पाताल लोक दे दिया और उनकी दानभक्ति को देखते हुए वर मांगने को कहा। बलि ने कहा -‘प्रभु आप सभी देवी-देवताओं के साथ मेरे लोक पाताल में निवास करें।’ और इस तरह श्री हरि समस्त देवी-देवताओं के साथ पाताल चले गए, यह दिन एकादशी (देवशयनी) का था।
एकादशी व्रत के नियम
एकादशी के दिन सुबह उठकर व्रत का संकल्प कर शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए।
विधिनुसार भगवान विष्णु का पूजन और रात को दीपदान करना चाहिए।
एकादशी की रात भगवान विष्णु का भजन-कीर्तन करना चाहिए।
एकादशी के दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए।
व्रत की समाप्ति पर श्री हरि विष्णु से अनजाने में हुई भूल या पाप के लिए क्षमा मांगनी चाहिए।
अगली सुबह यानी द्वादशी तिथि पर पुनः भगवान श्रीकृष्ण की पूजा कर यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।
भोजन के बाद ब्राह्मण को क्षमता के अनुसार दान देकर विदा करना चाहिए।










