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देश जब आजादी के जश्न में डूबा था तो महात्मा दिल्ली से मीलों दूर हैदरी महल में थे

भारत 15 अगस्त की रात को जश्न में डूबा था। दिल्ली हिंदुस्तान का भविष्‍य तय कर रही थी। उस समय मोहनदास करमचंद गांधी यानी महात्‍मा गांधी दिल्‍ली में नहीं थे। वह दिल्ली की सीमा से मीलों दूर कलकत्ता (अब कोलकाता) के ‘हैदरी महल’ में थे। आश्‍चर्य की बात है कि वह जिस आजादी के लिए नंगे पांव पूरे देश में घूमें थे। वहीं दिल्‍ली में आजादी का जश्न मनाने की बजाए बंगाल गए हुए थे।

गांधी जी से जब इसका कारण पूछा गया तो उनहोंने कहा- दुर्भाग्य से जैसी आजादी हमें मिली है। इस खंडित आजादी ने भारत और पाकिस्तान के बीच भविष्य की दुश्मनी के बीज बो दिए हैं। मैं 15 अगस्त की खुशी नहीं मना सकता। मैं आप लोगों को धोखा नहीं दे सकता। हालांकि मैं ये नहीं कहूंगा कि आप भी खुशियां न मनाएं।

साल 1946, देश आजादी पाने के लिए बैचेन था। द्वीतीय विश्व युद्ध की आग बुझी नहीं थी। ब्रिटेन की सरकार फैसला ले चुकी थी कि देश छोड़कर चले जाएंगे। मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में अपने स्वार्थ के लिए एक धड़े ने भारत को बांटने का दावा पेश कर दिया था। उनकी मांग थी पश्चिम के पेशावर से लेकर पंजाब के अमृतसर और कोलकाता समेत एक अलग राष्ट्र जो सिर्फ मुसलमानो के लिए बनेगा और जिसका नाम होगा पाकिस्तान। वहीं, डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी का एक देश,  एक विधान,  एक निशान और एक संविधान का नारा पूरे देश में गूंज रहा था। इस बीच मुस्लिम लीग की डायरेक्ट एक्शन डे की घोषणा ने पूरे देश को आग से खेलने पर मजबूर कर दिया था।

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जिन्ना ने कहा कि अगर समय पर बंगाल का सही फैसला नहीं मिला तो…हमें अपनी ताकत दिखानी पड़ेगी। भारत से हमें कोई लेना-देना नहीं। हमें पाकिस्तान चाहिए,  स्वाधीन पाकिस्तान चाहे भारत को स्वाधीनता मिले या न मिले। तब भारत मां की धरती गोली और बम की आवाज से कांप उठी थी। पूर्वी बंगाल का नोआखाली जिला। मुस्लिम बहुल इस जिले में हिंदुओं का व्यापक कत्लेआम हुआ था। कलकत्ता में 72 घंटों के भीतर 6 हजार से अधिक लोग मारे गए थे। 20 हजार से अधिक घायल हो गए थे। 1 लाख से अधिक बेघर हो गए थे। इसे ग्रेट कलकत्ता किलिंग भी कहा जाता है।

बंगाल की हालात देखकर अक्टूबर 1946 में महात्मा गांधी कलकत्ता जाते हैं। वहां से 6 नवंबर को वो नोआखाली जाते हैं। नोआखाली मुस्लिम बहुल इलाका था जहां दंगों में हजारों हिन्दू मारे गए थे। हिंसा के शिकार लोगों के सामने कोई रास्ता नहीं नजर आ रहा था। कभी साथ रहने वाले एक-दूसरे को शक की निगाहों से देख रहे थे। ऐसे में गांधी ने नोआखाली के हरेक गांव का दौरा किया। जब गांधी गांव-गांव जा रहे थे। ऐसा नहीं हुआ कि उनका स्वागत हुआ हो। जबकि उस वक्त ये परंपरा थी कि गांधी जब भी कहीं जाते थे भारी स्वागत होता था। गांधी नंगे पैर पूरे इलाके में घूमें। उनके साथियों ने उनसे चप्पल पहने को कहा तो उन्होंने कहा कि नौवखाली एक श्मसान है। यहां हजारों बेकसूर लोगों की समाधियां हैं और समाधी पर चप्पल पहनकर मैं नहीं जा सकता।

स्थानीय नेताओं की मदद से गांधी ने लोगों से शांति की अपील की। जिसका ये असर हुआ कि नौआखाली और आसपास के जिलों में हिंसा थमी। चार महीने नौआखाली में रहने के बाद फरवरी 1947 में वापस आते हैं। 9 अगस्त 1947 को गांधी दोबारा कलकत्ता जाते है। उन्हें आशंका थी कि 15 अगस्त के बाद दंगें दोबारा भड़केंगे। बंगाल प्रशासन के अधिकतर मुश्लिम अधिकारी पाकिस्तान जाने की तैयारी कर चुके थे। ये जो अधिकारी पाकिस्तान जा रहे थे। इन्हें ये डर था कि अगर ये भारत के इलाके में रूक जाते हैं तो एक साल पहले हुए दंगों का बदला हिन्दू उनसे ले सकते हैं। गांधी जब उस इलाके में पहुंचते हैं तो वे स्थानीय नेताओं की एक बैठक बुलाते हैं। ये नेता गांधी से कहते हैं कि वो नोआखाली न जाकर कलकत्ता ही रूक जाएं। जैसे ही महात्मा गांधी के कलकत्ता पहुंचने की खबर हुसैन शोहरावर्दी को लगी  वो भी वहां आ गए। गांधी नोआखाली जाने की जिद पर अड़े थे। शोहरावर्दी कहते हैं कि पिछले साल भी दंगे कलकत्ता में ही शुरू हुए थे। ऐसे में वे कलकत्ता रूक जाते हैं तो दंगे नहीं होंगे।

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गांधी का कहना था कि अहिंसा में कोई भी ताकत है तो इन हालातों में उसकी असली परीक्षा हो जाएगी। अगर अहिंसा हार गई तो ये बताने वाला मैं पहला व्यक्ति होना चाहता हूं। महात्मा गांधी ने सोहरावर्दी के सामने उन्हें भी वहीं रूकने की शर्त रखी। गांधी ने ये भी कहा कि उनकी सुरक्षा के लिए कोई पुलिस वाला वहां नहीं होना चाहिए। गांधी का मानना था कि ये उनके अपने लोग थे और अपने लोगों से मिलने के लिए उन्हें सुरक्षा की जरूरत नहीं। 11 अगस्त 1947 को गांधी जी 150बी डॉ. सुरेश चंद्र बनर्जी रोड कलकत्ता स्थित हैदरी मंजिल पर थे। वहां हजारों की संख्या में हाथों में काला झंडा लिए लोग गांधी वापस जाओ के नारे लगा रहे थे। उनकी शिकायत थी कि गांधी मुसलमानों को बचाने आए हैं और उन्हें हिन्दुओं की कोई फिक्र नहीं है। इन सब विरोधों से बेपरवाह गांधी जी ने 13 अगस्त को एक मीटिंग बुलाई। नाराज भीड़ के समक्ष गांधी जी बोलते हैं – तुम्हें अपने मुसलमान भाइयों को माफ कर देना चाहिए। अगर तुम उनकी सुरक्षा करोगे तो मैं वचन देता हूं कि नोआखाली में हिंदू भी सुरक्षित रहेंगे। थोड़ी देर बाद खबर आई कि कई जगहों पर हिन्दु-मुस्लिम मिलकर तिरंगा फहरा रहे हैं। अगले दिन मुस्लिम लीग खबर छापती है कि गांधी मरने को तैयार थे, ताकि हम शांति से जी सके।

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