रायपुर। स्वतंत्रता दिवस की संध्याकालीन बेला में राजधानी रायपुर स्थित मुक्ताकाशी मंच, महंत घासीदास संग्रहालय परिसर में देशभक्ति, राष्ट्रभावना और छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक एवं जनजातीय संस्कृति का मनोहारी संगम देखने को मिला। वंदेमातरम् की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने और ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के अंतर्गत संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा विशेष संध्याकालीन सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
नाटक, नृत्य, संगीत, प्रकाश और ध्वनि के प्रभावशाली संयोजन से सजे इस कार्यक्रम में स्वतंत्रता आंदोलन के दौर की परिस्थितियों से लेकर स्वतंत्र भारत के छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता तक की यात्रा को आकर्षक ढंग से मंच पर प्रस्तुत किया गया।

## वंदेमातरम् के साथ लोकनृत्यों का अनूठा संगम
भिलाई के प्रसिद्ध लोक कलाकार रिखीराम क्षत्रीय एवं उनकी टीम ने वंदेमातरम् की भावपूर्ण प्रस्तुति के साथ छत्तीसगढ़ के पारंपरिक और जनजातीय लोकनृत्यों की श्रृंखला प्रस्तुत की। सैला, करमा, गौर, माड़िया, राउत नाचा, सुआ और बारहमासी सहित विभिन्न लोकनृत्यों ने प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता के रंग बिखेरे।
पारंपरिक वेशभूषा, लोकवाद्यों की मधुर ध्वनि और कलाकारों की ऊर्जावान प्रस्तुतियों ने मुक्ताकाशी मंच को देशभक्ति और सांस्कृतिक उल्लास से भर दिया। कलाकारों ने लोकनृत्यों को वंदेमातरम् की राष्ट्रभावना से जोड़ते हुए यह संदेश दिया कि राष्ट्रीय एकता और मातृभूमि के प्रति गौरव की भावना भारत की विविध लोक परंपराओं में गहराई से रची-बसी है।
## नृत्य नाटिका में दिखी स्वतंत्रता आंदोलन से आधुनिक छत्तीसगढ़ तक की यात्रा
रिखीराम क्षत्रीय और उनकी टीम ने नृत्य नाटिका के माध्यम से अंग्रेजी शासनकाल की परिस्थितियों, सामाजिक चेतना और स्वतंत्रता की भावना को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। इसके बाद स्वतंत्र भारत में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक यात्रा तथा यहां की लोक एवं जनजातीय परंपराओं को मंच पर जीवंत किया गया।
नाटक, अभिनय, नृत्य और संगीत के संयोजन ने इतिहास और संस्कृति को एक साथ दर्शकों के सामने रखा। प्रस्तुति ने यह संदेश भी दिया कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक आजादी नहीं, बल्कि अपनी भाषा, संस्कृति, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए आगे बढ़ने का संकल्प भी है।
## प्रकाश और ध्वनि के संयोजन ने बढ़ाया कार्यक्रम का रोमांच
कार्यक्रम की खास विशेषताओं में प्रकाश और ध्वनि का प्रभावशाली संयोजन रहा। मंच पर बदलती रोशनी, ध्वनि प्रभाव, संगीत, नृत्य और अभिनय के मेल ने प्रत्येक दृश्य को जीवंत बना दिया। इस तकनीकी समन्वय ने प्रस्तुति के भावों को और प्रभावशाली बनाया और दर्शकों को पूरे कार्यक्रम से बांधे रखा।
राष्ट्रभक्ति के ओजस्वी भाव और छत्तीसगढ़ की लोकधुनों की ऊर्जा से सजी प्रस्तुति के दौरान मुक्ताकाशी मंच देशभक्ति के रंग में रंगा नजर आया। कलाकारों की शानदार प्रस्तुति पर दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से उनका उत्साह बढ़ाया।
## दर्शकों ने कहा- लोकसंस्कृति और वंदेमातरम् का संगम भावपूर्ण
कार्यक्रम देखने पहुंचे दर्शकों ने प्रस्तुति की जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की लोक एवं जनजातीय संस्कृति को वंदेमातरम् की राष्ट्रभावना के साथ इस तरह एकाकार होते देखना भावुक और गौरवपूर्ण अनुभव रहा।
दर्शकों के अनुसार नाटक, संगीत, लोकनृत्य, प्रकाश और ध्वनि का संयोजन इतना प्रभावशाली था कि कार्यक्रम कब समाप्त हो गया, इसका एहसास ही नहीं हुआ। कई दर्शकों ने भविष्य में ऐसे कार्यक्रमों की अवधि बढ़ाने की इच्छा भी जताई, ताकि छत्तीसगढ़ की अन्य लोक परंपराओं और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आनंद लिया जा सके।
## संचालक संजय कन्नौजे ने बताई आयोजन की महत्ता
कार्यक्रम के प्रारंभ में संस्कृति, पुरातत्व एवं राजभाषा संचालक संजय कन्नौजे ने वंदेमातरम् की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम की पृष्ठभूमि और उद्देश्य की जानकारी दी।
उन्होंने ‘हर घर तिरंगा’ अभियान की भावना को रेखांकित करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन देशभक्ति की भावना को जन-जन तक पहुंचाने के साथ समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और विरासत से जोड़ने का प्रभावी माध्यम हैं।
उन्होंने कहा कि वंदेमातरम् भारत की स्वतंत्रता चेतना, मातृभूमि के प्रति सम्मान और राष्ट्रीय एकता की भावना का महत्वपूर्ण प्रतीक है। इसके 150 वर्ष पूर्ण होना देश के लिए गौरव और स्मरण का महत्वपूर्ण अवसर है। संस्कृति विभाग ने इस अवसर को छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक एवं जनजातीय परंपराओं से जोड़कर प्रस्तुत किया है, ताकि नई पीढ़ी स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी करीब से समझ सके।
संजय कन्नौजे ने कहा कि छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी विविध लोककलाओं, जनजातीय परंपराओं, लोकनृत्यों और सांस्कृतिक विरासत से है। करमा, सुआ, राउत नाचा, पंथी, सैला, गौर, माड़िया और अन्य लोकनृत्य प्रदेश की सांस्कृतिक अस्मिता के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं। इन्हें वंदेमातरम् की राष्ट्रभावना के साथ जोड़कर प्रस्तुत करना आयोजन की विशेष उपलब्धि रही।
## नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने का प्रेरक प्रयास
स्वतंत्रता दिवस की संध्या पर आयोजित यह कार्यक्रम केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इतिहास, राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक विरासत को एक साथ समझने और महसूस करने का अवसर बना। छत्तीसगढ़ की लोक एवं जनजातीय परंपराओं को वंदेमातरम् के साथ जोड़कर प्रस्तुत किए जाने से नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने और उन पर गर्व करने का संदेश मिला।
वंदेमातरम् की 150 वर्ष की गौरवपूर्ण यात्रा और छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति के विविध रंगों का यह संगम स्वतंत्रता दिवस की संध्या को यादगार बना गया। राष्ट्रभावना, लोककला और सांस्कृतिक विरासत के इस अनूठे मिलन ने यह संदेश दिया कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में है और यही विविधता राष्ट्र की एकता को और अधिक मजबूत बनाती है।










