Ekhabri.com (धर्म दर्शन) । दीपावली के पांच दिवसीय पर्व में छोटी दिवाली यानी नरक चतुर्दशी का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। इस दिन जहां भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की पौराणिक कथा याद की जाती है, वहीं शाम के समय यमराज के नाम से दीपक जलाने की भी परंपरा है। इसे यम दीपदान या यम दीपक कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक दीपदान करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार पर यमराज की कृपा बनी रहती है।
क्या है यम दीपक जलाने की पौराणिक कथा?
यम दीपक जलाने के पीछे एक प्रचलित पौराणिक कथा है। मान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में हेम नाम के एक राजा के पुत्र की कुंडली में विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से मृत्यु होने का योग बताया गया था। जब राजकुमार का विवाह हुआ तो उसकी पत्नी को इस भविष्यवाणी के बारे में जानकारी मिली।

अपने पति की जान बचाने के लिए राजकुमारी ने विवाह के चौथे दिन महल के मुख्य द्वार पर सोने-चांदी के आभूषणों और दीपकों का ढेर लगा दिया। उसने पूरी रात दीपक जलाए रखे और स्वयं जागकर मधुर गीत गाती रही। मान्यता है कि जब यमराज सर्प का रूप धारण कर राजकुमार के प्राण लेने पहुंचे तो दीपकों की तेज रोशनी और आभूषणों की चमक से उनकी आंखें चौंधिया गईं। वे राजकुमार तक नहीं पहुंच सके और अंततः बिना प्राण लिए लौट गए।
इसी कथा के आधार पर नरक चतुर्दशी की रात यमराज के नाम से दीपदान करने की परंपरा प्रचलित हुई। मान्यता है कि इस दिन दीपक जलाने से परिवार के सदस्यों को अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है।
नरक चतुर्दशी को क्यों कहते हैं छोटी दिवाली?
नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली कहे जाने के पीछे भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर से जुड़ी पौराणिक कथा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नरकासुर नामक असुर ने अपने अत्याचारों से देवताओं और मनुष्यों को परेशान कर रखा था। उसने कई कन्याओं को बंदी बना लिया था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध कर बंदी कन्याओं को मुक्त कराया था।
इस विजय को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इसी कारण कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी कहा जाता है। यह पर्व दीपावली से ठीक पहले मनाया जाता है, इसलिए इसे छोटी दिवाली के नाम से भी जाना जाता है।
यम दीपक जलाने की क्या है परंपरा?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नरक चतुर्दशी की शाम को घर के बाहर यमराज के नाम से दीपक जलाया जाता है। कई क्षेत्रों में इसे घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर रखकर जलाने की परंपरा है। दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना जाता है।
परंपरागत रूप से मिट्टी के दीपक में सरसों का तेल डालकर रूई की बत्ती जलाई जाती है। कुछ परिवारों में चौमुखा दीपक जलाने की भी परंपरा है। दीपक जलाते समय यमराज से परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और अकाल मृत्यु से रक्षा की प्रार्थना की जाती है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इस परंपरा के तरीके में अंतर हो सकता है।
अभ्यंग स्नान और दीपदान का भी है विशेष महत्व
नरक चतुर्दशी के दिन अभ्यंग स्नान यानी तेल लगाकर स्नान करने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करना शुभ माना जाता है। कई स्थानों पर इसे रूप चौदस या रूप चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विशेष स्नान और पूजा करने से व्यक्ति को सौंदर्य, आरोग्य और सकारात्मक ऊर्जा का आशीर्वाद मिलता है।
छोटी दिवाली का पर्व हमें जीवन में प्रकाश, सकारात्मकता और सद्भाव का संदेश देता है। यम दीपदान की परंपरा के माध्यम से लोग अपने परिवार की खुशहाली और दीर्घायु की कामना करते हैं। दीपों की रोशनी के साथ यह पर्व दीपावली के स्वागत की तैयारियों को भी खास बना देता है।










