श्रीरामचरितमानस के अध्यायों को “कांड” कहा जाता है। आम बोलचाल की भाषा से कहने और सुनने में “कांड” शब्द थोडा अटपटा लगता है। मसलन, हम अक्सर अखबारों में पढ़ते हैं कि फलां जगह यह जघन्य कांड हो गया। कभी चोरी-डकैती तो कहीं हत्या आदि अपराधों के लिये भी “कांड” शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसके बावजूद रामचरितमानस जैसे पवित्र ग्रन्थ में ऐसी कौन सी बात है जो इसके अध्यायों को “कांड” शब्द से उद्बोधित किया जाता है। बालकाण्ड हो, या अरण्यकाण्ड या फिर किष्किंधाकांड या लंकाकांड। इसका उत्तर में श्रीरामचरित मानस में ही है।
हिंदू मान्यताओं के अनुसार कई योनियों में जन्म लेने के बाद मनुष्य योनि में जीव का जन्म होता है। मगर लोग जीवन दर्शन के अभाव में उसे ऐसे ही व्यर्थ कर देते हैं। हमारे प्राचीन ग्रन्थों रामायण, महाभारत, श्रीमद्भगवद्गीता और रामचरितमानस में मनुष्य को जीवन दर्शन करने की विधि भलीभांति बतायी गयी है। यही आध्यात्मिक भारत की शक्ति है। श्रीरामचरितमानस में भगवान राम के लिए भी कहा गया है-
बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सदग्रँथहिं गावा।।
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा।पाई न जेहि परलोक सँवारा।।
आज हम बताते हैं कि इन अध्यायों को “काण्ड” शब्द की संज्ञा क्यो दी गई है। इस शंका के समाधान के लिये हम आपको हमारे छत्तीसगढ़ के रायपुर में घटित एक घटना का उदाहरण देते हैं। रायपुर में प्रसिद्ध रामायणशास्त्री श्री रामकिंकर जी महाराज रामकथा कर रहे थे। वहां उपस्थित श्रद्धालुओ में से एक श्रद्धालु ने एक विचित्र शंकास्पद प्रश्न किया कि रामचरितमानस के अध्यायों को काण्ड क्यों कहते हैं। इसे घटना या दुर्घटना या अन्य किसी प्रकार की संज्ञा दी जा सकती थी। तब रामकिंकर जी महाराज ने मुस्कुराते हुये कहा, यह प्रश्न आज तक किसी ने शायद ही पूछा हो और यह निश्चित ही एक जानने योग्य बात है। “जब सोची समझी गयी रणनीति के तहत किसी कार्य को अंजाम दिया जाये, तो उसे कांड कहते हैं।”
संपूर्ण रामायण कोई साधारण कालखंड की घटना नहीं थी, जब जब लोगों में धर्म के प्रति आस्था कम होती जाये। तब-तब ईश्वरीय लीला के अनुरूप भगवान साक्षात मृत्युलोक में अवतार लेते हैं। रामायण में भगवान राम का जन्म लेना, गुरु विश्वामित्र के साथ जाकर कई राक्षसों का वध करना, फिर पिता की आज्ञा से वनवास, सीता का हरण, रावण वध, राजा राम के रूप में राज्याभिषेक, लोक लाज की मर्यादा के लिये सीता का परित्याग और अंत मे माता सीता का भूमि में स्थान ग्रहण करना यह सब ईश्वरीय लीला के अंतर्गत उस समय के जनमानस में जीवन दर्शन ,त्याग ,मर्यादा , एक आदर्श पुरुष के साथ साथ, पारिवारिक प्रेम के प्रति उदाहरण प्रस्तुत करना था यह सभी पूर्व निर्धारित था। यही कारण है कि रामचरितमानस के अध्यायों को कांड कहते हैं।
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