Google Analytics Meta Pixel Ekhabri खास खबर: फलीभूत होने लगा 'मेक इन इंडिया' का सपना - Ekhabri.com

Ekhabri खास खबर: फलीभूत होने लगा ‘मेक इन इंडिया’ का सपना

अशोक मधुप
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आज से आठ वर्ष पूर्व 2014 में देखा ‘मेक इन इंडिया’ का सपना अब फलीभूत होने लगा है। केंद्र सरकार द्वारा इसके लिए की गई पहल असर दिखाने लगी है।कभी जिन देशों से हम शस्त्र खरीदते थे, वे आज हमारे यहां बने शस्त्र और विमान की खरीद में रूचि दिखाने लगे हैं।

कभी हम छोटे बड़े सभी सामान के लिए दूसरे देशों पर निर्भर थे।सेना के लिए जरूरी शस्त्र और अन्य सामान रूस या दूसरे देशों से खरीदे जाते थे। हम ने अपने यहां के सरकारी प्रतिष्ठानों को मशीनी तंत्र में उलझा कर उनपर नाकारा होने का बट्टा लगा दिया था।इससे पहले देश के प्रतिष्ठानों को नाकारा सिद्ध करने की कोशिश हो रही थी।आज वे आधुनिक हथियार बना रहे हैं।

भारत का स्‍वदेशी जेट विमान तेजस आज पूरी दुनिया में धूम मचा रहा है। दुनिया के बड़े-बड़े देशों ने इसे खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है।डिफेंस इक्विपमेंट का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर अमेरिका भी पूरी तरह भारत में विकसित इस लड़ाकू विमान में दिलचस्पी दिखा रहा है। सरकार ने हाल में संसद में कहा कि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और फिलीपीन समेत छह देशों ने भारत के हल्के लड़ाकू विमान तेजस में रुचि दिखाई है। वहीं मलेशिया पहले ही इस विमान को खरीदने की तैयारी में है। भारत ने मलेशिया को 18 तेजस बेचने की पेशकश की है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा निर्मित तेजस एक इंजन वाला बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान है। इसकी क्षमता अत्यधिक खतरे वाले माहौल में परिचालन की है।कभी हमने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के बने विमान और हेलीकाप्टर को सेना के लिए अनुपयुक्त बता दिया था। रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायु सेना के लिए 83 तेजस हल्के लड़ाकू विमान (एलसीए) खरीदने के वास्ते पिछले साल फरवरी में एचएएल के साथ 48,000 करोड़ रुपये का पहले ही करार किया है। एचएएल को इन विमानों की 2023 से डिलीवरी शुरू करना है। मलेशिया अपने पुराने रूसी मिग-29 लड़ाकू विमानों को बदलने के लिए तेजस विमान खरीद रहा है।

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ये ही नहीं फिलीपींस करीब 37.49 करोड़ डॉलर (27.89 अरब रुपये) के ब्रह्मोस मिसाइल के खरीद रहा है। फिलीपींस की नौसेना के तटीय रक्षा रेजिमेंट में सबसे पहले ब्रह्मोस मिसाइल की तैनाती की जाएगी। भारत इंडोनेशिया को भी एंटी शिप वैरिएंट ब्रह्मोस मिसाइल बेचने जा रहा है। बताया जाता है कि ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल के बेचने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। इंडोनेशिया और भारत के बीच इस ब्रह्मोस मिसाइल को लेकर एग्रीमेंट पर पहले ही साइन हो सकते थे, लेकिन इंडोनेशिया के आंतरिक हालातों की वजह से इस साल के अंत तक या फिर अगले साल की शुरुआत में इस पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है। खास बात यह है कि भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने वाला इंडोनेशिया, आसियान का दूसरा देश होगा। इससे पहले फिलीपींस को यह मिसाइल भारत द्वारा बेची जा चुकी है।



रिपोर्टों के मुताबिक ब्रह्मोस को लेकर दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ और देशों के साथ बातचीत की जा रही है।

एक बड़ी उपलब्धि यह है कि अमेरिकी नौसेना के जहाज चार्ल्स ड्रयू रविवार को चेन्नई के कट्टुपल्ली के लार्सन एंड टूब्रो शिपयार्ड पहुंचा। ये जहाज रिपेयरिंग और कुछ दूसरी सेवाओं के लिए यहां आया है। रक्षा मंत्रालय ने इसे ‘मेक इन इंडिया’ को जबरदस्त ‘बढ़ावा’ देने वाला करार दिया है। मंत्रालय ने कहा है कि, “रिपेयरिंग के लिए पहली बार अमेरिकी नौसेना का जहाज भारत पहुंचा है। अमेरिकी नौसेना ने अपने इस जहाज के रखरखाव का ठेका भारतीय कंपनी लार्सन एंड टूब्रो (एलएंडटी) शिपयार्ड को दिया है।मंत्रालय ने कहा है, इससे ग्लोबल शिप रिपेयरिंग मार्केट में भारत की क्षमताओं का पता चलता है। भारतीय शिपयार्ड कम लागत में समुद्री जहाजों की बेहतरीन मरम्मत और रखरखाव मुहैया करा रहे हैं। अमेरिका के जहाज का भारत मरम्मत के लिए आना यह बताने के लिए काफी है। कि इस भारत के पास मरम्मत और देखरेख की सस्ती और विशव स्तरीय तकनीक मौजूद है। आज अमेरिकी जहाज आया है, आने वाले समय में अन्य देश के जहाज हमारे यहां आएंगें।देश की आय के साधन बढेंगे। आय के साधन भी रूपये के नही डालर के ब़ढ़ेंगे। विदेशी मुद्रा का भंडार भी बढ़ेगा ।

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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल में बताया कि एक समय ऐसा भी था जब भारत को दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा आयातक समझा जाता था लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। देश अब रक्षा उपकरणों का निर्यात करने वाले शीर्ष 25 देशों में शामिल हो चुका है। भारत अपनी रक्षा जरूरतों को विदेश से हासिल करता था। कुछ भी यहां नहीं बनता था। टैंक, रॉकेट, मिसाइल, गोला-बारूद सभी का आयात करते थे। रक्षा मंत्री ने कहा कि उन्होंने रक्षा हथियारों एवं उपकरणों से जुड़ी 309 सामग्रियों की एक सूची बनाई है। एक निश्चित समय के बाद इन सामग्रियों को बाहर से खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। रक्षा मंत्री ने बताया कि देश में इन रक्षा उपकरणों को बनाने का काम पहले ही शुरू किया जा चुका है। उधर आत्मनिर्भर भारत’ के आह्वान के बाद रक्षा खरीद परिषद (डीएसी) ने जून, 2022 को एक बैठक में 76,390 करोड़ रुपये की राशि सशस्त्र बलों के लिए पूंजी अधिग्रहण प्रस्तावों में प्रयोजन की स्वीकृति (एओएन) को मंजूर किया।इन्हें ‘खरीदें (भारतीय)’, ‘खरीदें और बनाएं (भारतीय)’ और ‘खरीदें (भारतीय-आईडीडीएम)’ श्रेणियों के अंतर्गत स्वीकार किया गया है। इससे भी भारतीय रक्षा उद्योग को पर्याप्त बढ़ावा मिलेगा और विदेशी खर्च में मुख्य रूप से कमी आएगी।

आठ साल कोई ज्यादा नहीं होते। देश की नाकारा छवि से बाहर आकर इस जगह तक पहुंचना बड़ी उपलब्धि है। ऐसे ही चलता रहा, सब ठीकठाक रहा तो हम दुनिया में भारत नए आयाम रचेगा।सभी क्षेत्रों में उसकी निर्माण कला का डंका बोलेगा।

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