रायपुर। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का आज 99 वर्ष की आयु में मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर में 3.30 मि. में निधन हो गया। जगद्गुरु शंकराचार्य श्री स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती दो मठों (द्वारका एवं ज्योतिर्मठ) के शंकराचार्य थे।
शंकराचार्य का पद हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण है, हिंदुओं का मार्गदर्शन एवं भगवत् प्राप्ति के साधन आदि विषयों में हिंदुओं को आदेश देने के विशेष अधिकार शंकराचार्यों को प्राप्त होते हैं।
वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। हाल ही में 2 सितंबर को उन्होंने अपना 99 वां जन्मदिन मनाया था। वह द्वारका की शारदा पीठ और ज्योर्तिमठ बद्रीनाथ के शंकराचार्य थे। शंकराचार्य ने राम मंदिर निर्माण के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। आजादी के आंदोलन में भी भाग लिया।
मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में हुआ था जन्म… स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के दिघोरी गांव में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता ने इनका नाम पोथीराम उपाध्याय रखा था। महज नौ साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़ धर्म की यात्रा शुरू कर दी थी। इस दौरान वो उत्तरप्रदेश के काशी भी पहुंचे और यहां उन्होंने ब्रह्मलीन श्री स्वामी करपात्री महाराज वेद-वेदांग, शास्त्रों की शिक्षा ली। साल 1942 के इस दौर में वो महज 19 साल की उम्र में क्रांतिकारी साधु के रूप में प्रसिद्ध हुए थे, क्योंकि उस समय देश में अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई चल रही थी।
15 महीने जेल में रहे थे इस लड़ाई के कारण वे वाराणसी में 9 महीने और मध्यप्रदेश की जेल में 6 महीने तक रहे। स्वामी स्वरूपानंद 1950 में दंडी संन्यासी बने। उन्होंने ज्योर्तिमठ पीठ के ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती से दण्ड-सन्यास की दीक्षा ली और स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती नाम से पहचाने जाने लगे। 1981 में उन्हें शंकराचार्य की उपाधि मिली। वे स्वामी करपात्री महाराज के राजनीतिक दल राम राज्य परिषद के अध्यक्ष भी बने।अशुभ समय में श्री राम मंदिर का भूमि पूजन बताया व साईं को भगवान बताने का मुखर विरोध करते रहे।।
साक्षात शंकर के प्रतिनिधित्व करने वाले हम सनातनी के धर्म प्रमुख के ब्रह्मलीन होना जब पितृ पक्ष का आरंभ हो चुका है। साक्षात ईश्वर का दर्शन किया है हम सभी ने, जिसका ना आदि है ना अंत है ऐसी सनातनी परम्परा के धर्मध्वजा वाहक पूज्यपाद शंकराचार्य जी का चराचर जगत् से महाप्रयाण सत्य ही अपूर्णीय क्षति है।
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