रायपुर, पूनम ऋतु सेन।कल के पोस्ट में हमने बस्तर दशहरे की विश्व प्रसिद्धि, उसका इतिहास और पौराणिक मान्यताओं के बारे में जाना था, इसी कड़ी में हम आज पाटजात्रा की सम्पूर्ण विधि के बारे में जानेंगे-
हरेली अमावस्या के दिन से बस्तर दशहरे की शुरुआत
75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरा की शुरुआत हरेली अमावस्या के दिन से होती है। इस दिन बस्तर दशहरे का प्रथम रस्म पाटजात्रा को विधिवत सम्पन्न किया जाता है। इसमें सभी वर्ग, समुदाय और जाति-जनजातियों के लोग हिस्सा लेते हैं। वर्ग भेदभाव के बिना सम्मिलत होकर पर्व मनाना, बस्तर के लोगों की आराध्य मां दंतेश्वरी माता के प्रति अगाध श्रद्धा को झलकाता है।
इस पर्व की शुरुआत हरेली अमावस्या को माचकोट के जंगल से लाई गई लकड़ी ठुरलू खोटला पर पाटजात्रा रस्म पूरी करने के साथ होती है। बस्तर दशहरा निर्माण की पहली लकड़ी को स्थानीय बोली में टूरलु खोटला एवं टीका पाटा कहते हैं। इस वर्ष(2021) भी बस्तर दशहरे के लिए तैयार किए जाने वाले रथ निर्माण की पहली सागौन की लकड़ी दंतेश्वरी मंदिर के सामने ग्राम बिलौरी से लाई गई है। प्रतिवर्ष राजमहल से भेजे गए पूजन सामाग्री से ही ‘साल की लकड़ी’ का पूजन किया जाता है, जिससे रथ का निर्माण होना होता है।
बली देने की परंपरा
पाट जात्रा पूजा विधान में झार उमरगांव बेड़ा उमरगांव के कारीगर जिनके द्वारा रथ का निर्माण किया जाना है, वे अपने साथ रथ बनाने के औजार लेकर आते है तथा रथ बनाने की पहली लकड़ी के साथ ही औजारों की पूजा भी की जाती है। परम्परानुसार मोंगरी मछली एवं बकरे की बली के साथ इस अनुष्ठान को संपन्न किया जाता है,जिसमें ग्रामीणों की भागीदारी भी होती है।
पाटजात्रा के कुछ तथ्यात्मक पहलुएं
बस्तर दशहरे की इस प्रथम प्रथा में जिसमे रथ निर्माण करने वाली लकड़ी की पूजा का विधान है, इसे सम्पन्न कराने के लिए कुछ आँचलिक जनजाति के आदिवासियों की सहायता ली जाती है, ये निवासी अपनी पूरी श्रद्धा के साथ इस पर्व में अपना योगदान देते हैं जैसे लकड़ी लाने का दायित्व अगरवरा, कचोरपाटी व राकेरा परगना के गांव का होता है। रथ बनाने वाले बढई झार उमरगांव के और रथ बनाने वाले लोहार बेड़ा उमरगांव के होते हैं, जबकि करंजी, सोनाबाल व केशपाल ग्राम निवासी रथ खींचने वाली रस्सी बनाते हैं।
बस्तर अंचल में लकड़ियों को पवित्र माना जाता है, यहाँ की जनजातीय संस्कृति में लकड़ी का विशिष्ट स्थान है। रथ निर्माण के लिए गोल लकड़ी का प्रयोग किया जाता है, इस लकड़ी की पूजा महल के सिंहद्वार पर लाकर हरेली अमावस्या के दिन किया जाता है। इस वर्ष भी हरेली के दिन यह रस्म विधिवत सम्पन्न हो चुका है।
पाटजात्रा की रस्म के बाद “Ekhabri विशेष बस्तर दशहरा” के अगली कड़ी में आगे की रस्म के बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा करेंगे, ऐसे ही छत्तीसगढ़ के अन्य रोचक पहलुओं के बारे में जानने के लिए Ekhabri.com से जुड़े रहें।
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