Google Analytics Meta Pixel रुठे-रुठे नेता मनाऊं कैसे? - Ekhabri.com

रुठे-रुठे नेता मनाऊं कैसे?

मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए दोनों प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस के नेतृत्व ने खूब सर्वे कराने के बाद काफी माथापच्ची कर प्रत्याशी तो तय कर दिए, लेकिन सूची जारी होने के बाद उम्मीदों ने बगावत की आग का रूप धारण कर लिया। पत्ता कटने से नाराज नेताओं की बगावत ने शीर्ष नेतृत्व की पेशानी पर बल ला दिया है। बीजेपी 69 सीटों पर तो कांग्रेस 51 सीटों पर अपने ही नेताओं की नाराजगी का सामना कर रही है। इन बागियों को मनाने में बीजेपी के सारे सूरमा फेल हो गए तो जीत के जादूगर अमित शाह खुद जादुई मंत्र लेकर मैदान में उतर पड़े हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस की ओर से कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और रणदीप सिंह सुरजेवाला ने मोर्चा संभाल लिया है।

 

 

 

 

कांग्रेस में 5 सर्वे और 11 बिंदु, नारी सम्मान योजना और जनाक्रोश यात्रा में सक्रियता और दो बार हारने वालों को टिकट नहीं का क्राइटेरिया तय किया गया था, पर करीब 100 सीटें ऐसी रही जहां यह फार्मूला फेल हो गया। पार्टी ने 230 सीटों पर प्रत्याशी तय तो कर दिया, लेकिन फाइनल सूची सामने आने के बाद दावेदारी में शामिल 1000 असंतुष्टों ने बगावत का झंड़ा उठा लिया। अब इनको मनाने के लिए पार्टी में डैमेज कंट्रोल में जुट गई है। बागियों को मनाने का जिम्मा पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और मप्र कांग्रेस के इंचार्ज जनरल सेक्रेटरी रणदीप सिंह सुरजेवाला को सौंपा गया है।

 

 

 

सत्तारुढ़ बीजेपी भी बागियों से दो-चार हो रही है। उसे 69 सीटों पर अपने ही नेताओं के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। बीजेपी में पिछले 10 दिन के अंदर बागियों की संख्या दोगुनी से ज्यादा हो चुकी है। अगर इनकी नाराजगी ऐसे ही बनी रहे तो बीजेपी का सत्ता बचाए रखने का स्वप्न मतदान से पहले ही टूट जाएगा। प्रदेश के सारे दिग्गज इनको मनाने का प्रयास कर चुके हैं, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। बेकाबू हालात को संभालने की जिम्मेदारी अब पार्टी के चाणक्य अमित शाह ने खुद संभाल ली है।

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मध्य प्रदेश में बागियों की नाराजगी दूर करना आसान नहीं है। हालात यह है कि एक को मनाओ तो दूजा रूठ जाता है। पार्टी के पुराने नेताओं को ही तवज्जो दो तो नए नेता बगावत का झंडा बुलंद कर दे रहे हैं। नए और जिताऊ चेहरे मान कर दूसरों पर पार्टी ने दांव तो लगा दिया तो पुरानों ने नाक में दम कर दिया है। इस बार बागियों के सामने अकेले या निर्दलीय चुनाव लड़ने की मजबूरी नहीं है। मैदान में इतने दल उतरे हैं कि हर बागी को एक इलेक्शन सिंबल का सहारा मिल गया है और दलों को एक संभावित जिताऊ उम्मीदवार। अब भाजपा और कांग्रेस मतदान पहले रुठे नेताओं को मनाने में कितना सफल होते हैं, यह तो समय ही बताएगा।

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