छत्तीसगढ के कोंडागांव में घर की बिजली या बिजली के उपकरण खराब हो जाएं तो यहां लोग ठीक करवाने के लिए ‘कलेक्टर’ या ‘पुलिस’ को बुलाते हैं। यह जानकार आपको आश्चर्य हो रहा होगा, मगर यह सच है। दरअसल यहां बिहार का मूल निवासी एक परिवार रहता है। इस परिवार के सदस्य का नाम कलेक्टर, पुलिस, वकील आदि है और पूरा परिवार बिजली का मैकेनिक है।
कोंडागांव से दो किलोमीटर दूर कुम्हारपारा में रहने वाले इस परिवार में सबके ऐसे ही नाम हैं। पिता का नाम सूबेदार सिंह। उसके पांच बेटे हैं। पांचों बेटों का नाम है कलेक्टर सिंह, पुलिस सिंह, दरोगा सिंह, वकील सिंह और जज सिंह। परिवार के सभी सदस्य बिजली मैकेनिक हैं। हालांकि वे मूलत: बिहार के हैं, लेकिन पिछले 25 सालों से यहीं रहते हैं।
सूबेदार के पुत्र कलेक्टर सिंह ने बताया कि घर में कोई भी बच्चा जीवित नहीं बचता था। नामकरण के बाद उसकी मौत हो जाती थी तो पिता उनके पिता बच्चों का नामकरण कराना बंद कर दिया। उन्होंने अपने पूर्वजों से सुना था कि अजीबोगरीब नाम रखने से बच्चे बच जाते हैं। लोग इसे कुछ भी कहें, उनके पिता ने अपने बच्चों के नाम प्रशासनिक पदों के हिसाब से रख दिए। अब इस गांव के किसी के घर बिजली का कोई काम होता है तो वे सीधे कहते हैं, जाओ कलेक्टर या पुलिस को बुला लाओ।
गांवों में आज भी यह परंपरा और मान्यता है कि जब परिवार में किसी भी वजह से लगातार बच्चों की मौतें होती हैं तो बच्चे को एक घर से दूसरे घर में बेचा जाता है या उन बच्चों का नाम ऐसा रखा जाता है जो बोलने सुनने में अजीब हो। इसके अलावा बेचने की परंपरा केवल दिखावा या डेमो की तरह होती है। मान्यता यह भी है कि ऐसा करने से बच्चों की उम्र लम्बी हो जाती है।
ऐसा पहले होता था कि लोग झाड़ूराम, कचराबाई और इस तरह के नाम रखते थे ताकि उम्र बढ़ जाए। इसका तर्क यह होता था कि नज़र लगने से मौत हो जाती है। हालांकि सच्चाई यह है कि पुराने जमाने में चिकित्सा की उतनी सुविधा नहीं थी। बच्चों की मृत्यु दर ज्यादा थी। प्रसव वाली महिलाओं की मृत्युदर ज्यादा थी। डिलीवरी पहले घरों में भी हुआ करती थीं, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। छोटे-छोटे गांवों में भी अच्छे अस्पताल हैं। इसलिए इस धारणा को बदलना चाहिए कि कुछ भी नाम रखने से बच्चों की उम्र बढ़ जाती है। हालांकि नाम रखना बेहद निजी मसला है।
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