केंद्र की मोदी सरकार अब केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के लिए नया कानून बनाने जा रही है। इसके तहत सीबीआई की भूमिका और कार्यप्रणाली को राष्ट्रीय आकार दी जाएगी। केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय इस पर गृह मंत्रालय के सहयोग से काम करेगा। नया कानून बनने से सीबीआई को राज्य सरकारों से सहमति लेने की जरूरत नहीं होगी। इस बदलाव का कारण यह है कि अब तक सीबीआई दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट एक्ट-1946 के तहत काम कर रही है। इस कानून की सीमाओं पर विचार-विमर्श के बाद संसद की स्थायी समिति ने सिफारिश की है कि सीबीआई के लिए अलग से कानून बने।
जानकार बताते हैं कि नया कानून संघीय स्तर का होगा। अभी तक सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के निर्देश हों तो राज्य सरकारों की सहमति की जरूरत नहीं पड़ती। इससे इतर मामलों में केंद्र सरकार को सीबीआई की जांच का दायरा बढ़ाना पड़ता है। जांच एजेंसी राज्य सरकार से अनुमति लेकर केस दर्ज करती है। इसके कारण राज्य सरकारों ने अपने-अपने हिसाब से सहमति देने के प्रावधान बना रखे हैं। इसे जनरल कंसेंट कहते हैं। कुछ राज्य सरकारों ने जनरल कंसेंट के बजाए विशिष्ट अनुमति की व्यवस्था की है। ऐसे में हर मामले में राज्य सरकार से मंजूरी चाहिए।
इस समय सीबीआई की जांच का दायरा सिर्फ केंद्र शासित प्रदेश या रेलवे के एरिया तक सीमित है। ऐसे में केस दर्ज करने या किसी केस को अपने हाथ में लेने के लिए राज्य सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है। पिछले 7 साल में 9 राज्य सरकारें सीबीआई से जनरल कंसेंट वापस ले चुकी हैं। यह संयोग नहीं है कि इनमें ज्यादातर वे राज्य हैं, जहां केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा की सरकार नहीं हैं।
समिति ने कहा कि मौजूदा कानून में एजेंसी का दायरा सीमित है। नया कानून ऐसा हो, जिसमें सीबीआई का दर्जा, कामकाज, अधिकार तय हों और निष्प्क्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के प्रावधान हों। यही सिफारिश केंद्र सरकार के लिए इस मुद्दे पर आगे बढ़ने का ठोस आधार बनी।










