दिल्ली दंगा मामले में सुनवाई के दौरान पुलिस ने हाई कोर्ट के समक्ष दावा किया कि उमर खालिद, शरजील इमाम, खालिद सैफी समेत अन्य आरोपितों के भड़काऊ भाषण में एक तथ्य समान था कि वे मुस्लिम आबादी में भय पैदा करना चाहते थे। पुलिस ने उमर खालिद की जमानत अर्जी का जोरदार तरीके से विरोध किया।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और रजनीश भटनागर की पीठ के समक्ष विशेष लोक अभियोजक अमित प्रसाद ने पुलिस का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि जब आप बाबरी मस्जिद या तीन तलाक के बारे में बात करते हैं तो ये एक धर्म से संबंधित है, लेकिन कश्मीर के बारे में बात करते हैं तो यह राष्ट्रीय एकता का मुद्दा हो जाता है। उन्होंने फरवरी, 2020 में महाराष्ट्र के अमरावती में उमर खालिद के भाषण का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें केवल सीएए और एनआरसी ही विरोध का केंद्र बिदु नहीं था, बल्कि विशेष रूप से एक समुदाय से संबंधित अन्य मुद्दों से जुड़ा था।
प्रसाद ने उमर के वकील त्रिदीप पेस के उस तर्क को खारिज कर दिया कि उमर के भाषण में कुछ भी गलत नहीं था। प्रसाद ने कहा, उमर का भाषण बहुत ही नपा-तुला था। इसमें कई बिदु शामिल हैं। पहला बाबरी मस्जिद, दूसरा-तीन तलाक, तीसरा-कश्मीर, चौथा-मुसलमानों को दबाया जाना, पांचवां सीएए और एनआरसी था। प्रसाद ने कहा कि दंगों के दौरान गलत सूचना फैलाई गई थी और विरोध स्थलों से सड़कों को अवरुद्ध किया गया।
पुलिसकर्मियों और अर्धसैनिक बलों पर हमले हुए। गैर मुस्लिम क्षेत्रों में हिंसा फैल गई। सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया और पेट्रोल बम समेत अन्य हथियारों का प्रयोग हुआ। इससे पता चलता है कि आपकी शिकायत सीएए और एनआरसी के खिलाफ नहीं है। यह बाबरी मस्जिद और कश्मीर के खिलाफ है। यह एक पैटर्न है। विभिन्न व्यक्तियों की मदद से वाटसएप ग्रुपों के माध्यम से विरोध को संचालित किया जा रहा था। विरोध स्थल स्वत: नहीं बने, बल्कि बनाए गए थे।
पीठ ने कहा कि विभिन्न अभियुक्तों के खिलाफ लगाए गए आरोपों के साथ अभियोजन पक्ष की दलीलों में ओवरलैप है। याचिकाकर्ता मंगलवार तक तय करके बताएं कि वे मामले में एक साथ सुनवाई चाहते हैं या फिर अलग-अलग।
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