रायपुर। (पूनम ऋतु सेन), राजधानी रायपुर से लगभग 20 किलोमीटर दूरी में मुम्बई-कोलकाता नेशनल हाईवे पर रायपुर से भिलाई के मध्य कुम्हारी स्थित है, इसी स्थल पर माँ महामाया का प्रसिद्ध मंदिर है।
इस मंदिर के गर्भगृह में ही माता की मूर्ति विराजमान हैं। माँ महामाया देवी को देखने से लगता है की माँ महामाया की प्रतिमा का स्वरूप ईशान कोण में विराजमान है।
महामाया माता को स्वयंभू मां माना गया है, जो अपने आप ही जमीन से प्रकट हुई हैं।
देश विदेश के लोगों द्वारा कलश स्थापना

कुम्हारी के प्रसिद्ध माँ महामाया मंदिर में चैत्र व क्वार नवरात्रि में अखण्ड ज्योति कलश की स्थापना की जाती है, यहाँ भक्तगण अपने मनोकामनाओं के पूर्ण होने की आस में ज्योत दर्शन करने आते हैं जिनमें केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं वरन विश्व के अनेक प्रवासी भारतीयों के द्वारा ज्योति कलश की स्थापना करायी जाती है, इनमें कनाडा, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड व अन्य कई देशों में रहने वाले भारतीय भक्त शामिल हैं। मंदिर के पुजारी के अनुसार यहां नवरात्र में 2000 से भी ज्यादा ज्योत प्रज्ज्वलित किये जाते हैं।

नवरात्र में होता है विशेष श्रृंगार और पूजा
माँ महामाया मंदिर में दुर्गा, कालभैरव, राधा कृष्ण, शिवलिंग, हनुमान जी, शनिदेव, और रामजानकी का की मूर्तियाँ भी स्थापित की गयीं है।नवरात्रि पर्व पर-कुम्हारी के प्रसिद्ध माँ महामाया मंदिर में नवरात्रि के नौ दिनों तक महामाया देवी को आभूषणों से सजाया जाता है, जिसे देखने के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु दूर-दूर से आते है।
महामाया मंदिर के पुजारी के अनुसार उनका परिवार विगत 50 वर्षों से माता की सेवा में कार्य कर रहें हैं , उन्होंने बताया कि मंदिर का अब सौंदर्यीकरण कर दिया गया है, यहाँ पंचमी से नवमी तक विशेष पूजा करायी जाती है और इस अवसर पर भक्तों का तांता लगा रहता है।
ये बात बहुत कम लोगों को ही पता है कि माँ महामाया मंदिर में महामाया देवी के पैरों के नीचे में महादेव की प्रतिमा विराजमान है।

भंडारे का आयोजन
नवरात्रि के उत्सव पर माँ महामाया मंदिर में भंडारे का आयोजन किया जाता है। जिसमे भारी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित होते है। माँ महामाया मंदिर के प्रांगण से कुछ दूर में जलकी है जिसे तालाब भी कहते है जिसमे कमल का फूल बारिश के समय में और भी मन को मोह लिया करता हैं। समितियों और ट्रस्ट के द्वारा दशहरा के दिन रावण दहन होने के बाद इसी जलकुंड में ज्योत को विसर्जित कर दिया जाता है।

मंदिर का इतिहास
माँ महामाया देवी स्वयंभू है। स्वपन के आधार पर माँ इस जगह में प्रगट हुई। पहले इस जगह में घना जंगल हुआ करता था लोग यहाँ आने से डरा करते थे। पहले के समय में इस मंदिर को छोटा सा झोपडी नुमा बनाया गया था धीरे -धीरे माता जी की कृपा से यह मंदिर का विकास हुआ है। माँ महामाया देवी की प्रतिमा ईशान कोण में है। पुराणों में कहते है की जो मूर्ति ईशान कोण की तरफ होती है उसे तीर्थ का महत्व मिलता है ।









