सुप्रभात: कुएँ में पानी लाना नहीं पड़ता है!


एक आदमी एक कुवाँ निर्मित करने के लिए, जमीन खोदता है, पत्थर निकालता है, मिट्टी निकालता है और नीचे झरने फूट पड़ते हैं, कुएँ में पानी भर जाता है । कुएँ में पानी मौजूद था, पानी कहीं से लाना नहीं पड़ा । केवल बीच में कुछ पत्थर एवं मिट्टी की पर्ते थीं, उन्हें अलग कर देना पड़ा । कुछ अवरोध थे, कुछ बाधायें थीं, उनको अलग कर दिया गया, तो पानी प्रगट हो गया । कुएँ में पानी लाना नहीं पड़ता, पानी स्वयं आता है, लेकिन जो बीच में रुकावट थी उसको दूर करना पड़ता है ।


सुख-शांति और ज्ञान भीतर मौजूद है, उसे कहीं से लाना नहीं है, उनके झरने भीतर छिपे हैं, केवल बीच की बाधाएँ- पत्थर और मिट्टी अलग कर देनी है, वो पत्थर और मिट्टी है– काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, आशा, तृष्णा, जिसे सत्संग व सेवा रुपी कुदाली से खोद कर फेंक देने से, सुख-शांति एवं ज्ञान के झरने प्रगट होने शुरू हो जायेंगे ।

सीख :- सुख-शांति, ज्ञान, मोक्ष हमारा स्वरुप ही है । हमें षट विकार रूपी कीचड़ को सत्संग एवं सेवा रूपी निर्मल जल से मात्र धोना है ।

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