सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पत्नी और नाबालिग बच्चों की वित्तीय मदद कराना पति का पवित्र कर्तव्य है,भले ही इसके लिए उसे शारीरिक श्रम ही क्यों न करना पड़े, अगर वह शारीरिक रूप से सक्षम है। अदालत ने कहा कि कानून में वर्णित कानूनी रूप से अनुमेय आधारों को छोड़कर वह अपने दायित्व से बच नहीं सकता है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 की कल्पना उस महिला की पीड़ा, कष्ट और वित्तीय परेशानी को दूर करने के लिए ही की गई थी, जिसे अपने और अपने बच्चों के लिए कुछ उपयुक्त व्यवस्था करने के लिए वैवाहिक घर छोड़ना पड़ता है।
जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने एक पति को अलग रहने वाली पत्नी को भरण पोषण के लिए 10,000 रुपये प्रति माह देने का आदेश देते हुए यह टिप्पणी की। इसके अलावा परिवार अदालत के बच्चों के भरण पोषण के लिए छह हजार रुपये प्रति माह देने के आदेश को भी बहाल रखा। पति ने पत्नी के सतीत्व पर सवाल उठाते हुए अपने बेटे का डीएनए टेस्ट कराने की मांग की थी।
शीर्ष अदालत ने फरीदाबाद परिवार न्यायालय के आदेश के खिलाफ महिला की याचिका स्वीकार कर ली। परिवार न्यायालय के आदेश को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा था। शीर्ष अदालत ने कहा कि परिवार न्यायालय ने इस मामले में आदेश देते हुए स्थापित कानूनी पहलुओं को ध्यान में नहीं रखा और बहुत ही विकृत तरीके से सुनवाई की। हाई कोर्ट ने भी गलत आदेश की पुष्टि कर दी। परिवार अदालत ने महिला और उसकी बेटी के लिए भरष पोषण की दलील खारिज कर दी थी, लेकिन पुत्र के लिए छह हजार रुपये प्रति माह देने का आदेश दिया था।










