Google Analytics Meta Pixel बस्तर में बदलती तस्वीर…कभी दहशत का गढ़ अब नक्सलियों के कमजोर होते नेटवर्क की कहानी - Ekhabri.com

बस्तर में बदलती तस्वीर…कभी दहशत का गढ़ अब नक्सलियों के कमजोर होते नेटवर्क की कहानी

जगदलपुर : से सामने आ रही तस्वीर बस्तर के बदलते हालात की स्पष्ट झलक देती है। एक समय था जब बस्तर क्षेत्र माओवादी संगठन का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता था। घने जंगल, दुर्गम पहाड़ियां और अंदरूनी इलाके नक्सलियों के सुरक्षित ठिकाने थे, जहां से वे बड़े हमलों को अंजाम देते थे।लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। जिन हथियारों के दम पर माओवादी वर्षों तक दहशत कायम रखते थे, वही हथियार अब लगातार सुरक्षा बलों के कब्जे में पहुंच रहे हैं। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि बस्तर में माओवादी नेटवर्क कमजोर पड़ चुका है।

 

ऑपरेशन से आगे बढ़ी रणनीति, अब सीधे सैन्य ताकत पर वार

 

सुरक्षा बलों की रणनीति अब केवल मुठभेड़ों तक सीमित नहीं रह गई है। अब फोकस माओवादियों की सैन्य क्षमता को जड़ से खत्म करने पर है। लगातार सर्चिंग अभियान, अंदरूनी इलाकों में दबिश और मुठभेड़ों के दौरान बड़ी मात्रा में हथियार बरामद किए जा रहे हैं।AK-47, INSAS, SLR जैसे आधुनिक हथियारों की जब्ती और आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों द्वारा हथियार सौंपना यह दिखाता है कि संगठन के भीतर मनोबल टूट रहा है।

 

जंगलों में छिपे हथियार डंप पर कार्रवाई, हर रिकवरी बन रही बड़ा सबूत

 

सुरक्षा एजेंसियों के सामने एक बड़ी चुनौती जंगलों में छिपाए गए हथियारों के डंप को खोज निकालना है। माओवादी वर्षों से जमीन के नीचे, गुफाओं और गुप्त ठिकानों में हथियार छिपाकर रखते थे।अब लगातार इन ठिकानों का पता लगाकर हथियार बरामद किए जा रहे हैं। हर रिकवरी यह साबित कर रही है कि संगठन की पकड़ ढीली हो रही है और उसकी हमलावर क्षमता कमजोर पड़ रही है।

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आंकड़े बता रहे बदलता ट्रेंड, दो साल में तेजी से बढ़ी बरामदगी

 

प्रदेश गठन के बाद से अब तक बस्तर में साढ़े तीन हजार से अधिक हथियार बरामद किए जा चुके हैं। हाल के वर्षों के आंकड़े इस बदलाव को और स्पष्ट करते हैं:

 

2020 में 89 हथियार

 

2021 में 80 हथियार

 

2022 में 61 हथियार

 

2023 में 35 हथियार

 

2024 में 286 हथियार

 

2025 में रिकॉर्ड 677 हथियार

 

2026 में अब तक 316 हथियार बरामद

 

इन आंकड़ों से साफ है कि पिछले दो वर्षों में कार्रवाई तेज हुई है और नक्सलियों की ताकत पर सीधा असर पड़ा है।

 

कभी ताकत का प्रतीक रहे हथियार अब बन रहे कमजोरी का कारण

 

माओवादियों के पास कभी AK-47, INSAS, SLR, LMG और BGL जैसे घातक हथियार बड़ी संख्या में हुआ करते थे। इन्हीं के दम पर वे घात लगाकर हमले, कैंप पर फायरिंग और बड़े एंबुश को अंजाम देते थे।लेकिन अब लगातार ऑपरेशन और बरामदगी के चलते उनका यह जखीरा खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है। हथियारों की कमी अब संगठन की सबसे बड़ी कमजोरी बनती जा रही है।

 

बड़े ऑपरेशन के बाद टूटा मनोबल, सरेंडर का बढ़ा सिलसिला

 

विशेष अभियानों के दौरान नक्सलियों के हथियार निर्माण से जुड़े उपकरण भी जब्त किए गए, जिससे उनकी उत्पादन क्षमता को बड़ा झटका लगा। इसके बाद से ही नक्सलियों का मनोबल कमजोर पड़ा है और मुख्यधारा में लौटने का सिलसिला तेज हुआ है।

 

पुराने हमलों से जुटाए थे हथियार, अब पूरा तंत्र बिखरने की कगार पर

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जानकारों के अनुसार माओवादियों ने अपने हथियार लूट, तस्करी और अवैध निर्माण के जरिए जुटाए थे। ओडिशा के कोरापुट शस्त्रागार लूटकांड और बस्तर के बड़े हमलों के बाद सुरक्षा बलों से हथियार छीनना उनकी रणनीति का हिस्सा रहा है।लेकिन अब लगातार हो रही कार्रवाई के कारण यह पूरा नेटवर्क बिखरता नजर आ रहा है। तेलंगाना, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी नक्सलियों द्वारा हथियार छोड़ने की घटनाएं सामने आ रही हैं।

 

बदलते बस्तर की नई कहानी, दहशत से विकास की ओर बढ़ते कदम

 

आज बस्तर की तस्वीर बदल रही है। जो हथियार कभी दहशत का प्रतीक थे, वही अब माओवादी संगठन के पतन की कहानी कह रहे हैं। सुरक्षा बलों की सख्त रणनीति और लगातार कार्रवाई से क्षेत्र में शांति और विकास की उम्मीद और मजबूत हो रही है।

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