जबलपुर में गोलाकार चट्टानों से घिरी पहाडि़यों के बीचों बीच खड़ा मदन महल का ऐतिहासिक किला आज भी कई रहस्य समेटे है। एक बड़ी ग्रेनाईट चट्टान को तराशकर बनाए गए इस किले का उपयोग रानी दुर्गावती सैनिक छावनी के रूप करती थीं। यहां ये वह पूरे शहर पर आसानी से नजर रखती थीं। वर्तमान में यह किला खंडहर में तब्दील हो गया है, लेकिन पर्यटक शाही परिवार का मुख्य कक्ष, युद्ध कक्ष, छोटा सा तालाब और अस्तबल देख कर रोमाचिंत हो सकते हैं।
इस किले में रानी की यादें बसी हैं। वह पत्थर आज भी यहां देखने मिलता है जिस पर दुर्गावती अपने घोड़े पर बैठकर किले के नीचे छलांग लगाकर युद्ध का अभ्यास करती थीं। किला मार्ग के पहले पहाड़ी के नीचे हरियाली के बीच एक चटटान पर टिका बैलेंसिंग राक विज्ञानिकों के लिए आज भी कौतुहल का विषय बना हुआ है।
कई क्विंटल वजनी ये एक बड़ा पत्थर महज कुछ इंच के आधार पर दूसरे पत्थर से टिका वर्षों से अपनी जगह पर खड़ा है। इसका बैलेंस ऐसा है कि बड़े से बड़े भूकंप के झटके भी इसे आज तक नहीं हिला पाए हैं। शारदा मां का प्राचीन मंदिर है। घूमने -फिरने के लिए यह स्थान बहुत ही रोमांचक व आनंदित करने वाला है।
मदन महल पहाड़ी पहले से ही विभिन्न प्रजातियों के फल, औषधिय और छायादार वृक्षों से आच्छादित थी। प्रशासन ने भी इसमें वृहद स्तर पर वृक्षारोपण कराया। किले की विशेषता ये है कि कक्ष में की गई नक्काशी आज नजर आती है। यहां युद्ध कक्ष, छोटा सा तालाब और अस्तबल देख सकते हैं। हालांकि वक्त के साथ ये खंडहर हो चुके हैं। यहां घूमने के लिए सुबह और शाम का वक्त बेहद उपर्युक्त है।
किले में यह है खास
-मदन महल किला जमीन से करीब 500 मीटर की ऊंचाई पर एक बड़ी ग्रेनाईट चट्टान को तराशकर बनाया गया है।
– किले के भीतर दीवार, छत पर की गई नक्काशी आज भी नजर आती है
– किले की चोटी पर पहुंचने पर आपको जबलपुर शहर का खूबसूरत नज़ारा दिखाई देगा।
– यहां एक गुप्त सुरंग मिली थी जिसे अब बंद कर दिया गया है। ये सुरंग मंडला जाकर खुलती थी।
बैलेसिंग राक सैलानियों की पहली पंसद
पहाड़ी के नीचे बैलेंसिंग राक है। इसे देखने सैलानी बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं। यहां पर एक बड़ी सी चट्टान के ऊपर कुछ इंच के आधार पर एक दूसरी चट्टान रखी हुई है। इसे देखने से ऐसा लगता है जैसे ये किसी भी वक्त गिरने वाली है। मगर यह कई सालों से इस स्थिति में रखी हुई है। साल 1997 में 22 मई को 6.2 की तीव्रता वाला भूकंप भी डिगा नहीं पाया। इस भूकंप ने जबलपुर में भारी तबाही मचाई थी। उस दौरान कई इमारत भूकंप के झटकों से जमींदोज हो गए थे। लेकिन पूरे शहर में एक यही बैलेंसिंग राक था, जिस पर भूकंप के झटकों का कोई असर नहीं पड़ा था। इस बैलेंस राक को देखने के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं। नगर निगम, जिला प्रशासन और स्मार्ट सिटी द्वारा यहां तक पहुंचने सीमेंटेट सड़क बनाई है। बैलेंसिंग राक के चारो तरफ रंग-बिरंगी लाइट लगाई है।
रानी दुर्गावती ने अपने साम्राज्य में अकाल पड़ने पर शारदा माता की प्रतिमा स्थापित कर उनका आह्वान किया। मां अपनी बेटी के आग्रह को टाल न सकीं और इस तरह मां की प्रतिमा के स्थापित होने के बाद साम्राज्य में वर्षा का दौर शुरू हुआ। यही वजह है कि आराधना व भक्ति के साथ यह स्थान मनोकामना पूर्ण करने के लिए भी जाना जाता है। कहा जाता है कि सुरंग के रास्ते रानी दुर्गावती मंडला से मदनहल किले तक आती थीं। किले के दूसरे रास्ते से शारदा मंदिर पहुंचकर पूजन करती थी। यहां आने वालों को शांति और सुकून मिलता है।
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