मनरेगा से लगाए गए अर्जुन और साजा के पेड़ों पर कोसा उत्पादन कर खेतिहर मजदूर बने ‘रेशमी’ किसान
रायपुर। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि एक मजदूर लाखों कमा सकता है। खरीफ की फसल के बाद खाली वक्त में मजदूरी करने वाले बीजापुर के एक किसान ने ये कर दिखाया है।
मनरेगा और रेशम विभाग के अभिसरण ने पांच ऐसे छोटे किसानों को कोसा उत्पादन का मौका दिया है जो हर साल खरीफ की फसल के बाद साल के बाकी समय में मजदूरी की तलाश में रहते थे। बीजापुर जिले के शासकीय कोसा बीज केंद्र, नैमेड़ में आयतु कुड़ियम और उनके चार साथी अर्जुन व साजा के पेड़ों पर कोसा कीट पालन कर कोसा फल का उत्पादन और संग्रहण कर रहे हैं। इस काम से पिछले तीन वर्षों में उन्होंने ढाई लाख रूपए की कमाई की है। पांच किसानों के इस समूह द्वारा उत्पादित कोसा फल को रेशम विभाग कोकुन बैंक के माध्यम से खरीदता है। इससे सालभर उन्हें अच्छी आमदनी हो जाती है।
रेशम विभाग के अधिकारियों ने बताया कि शासकीय कोसा बीज केन्द्र, नैमेड़ में 12 वर्ष पहले मनरेगा के अंतर्गत करीब साढ़े तीन लाख रूपए की लागत से 28 हेक्टेयर में लगभग 16 हजार 800 साजा और इतनी ही संख्या में अर्जुन के पौधे रोपे गए थे। अब ये पौधे करीब दस फीट के पेड़ बन चुके हैं। रेशम विभाग के द्वारा इन पेड़ों पर रेशम के कीड़ों का पालन कर कोसा फल उत्पादन का कार्य करवाया जा रहा है। स्थानीय किसान और खेतिहर मजदूर आयतु कुड़ियम ने वर्ष 2015 में रेशम विभाग के कर्मचारी की सलाह पर वहां मजदूर के रूप में काम करना शुरू किया था। अपनी सीखने की ललक के चलते उन्होंने धीरे-धीरे वहां कोसा फल उत्पादन का प्रशिक्षण लेना भी शुरू कर दिया। सालभर में वह इसमें पूरी तरह से दक्ष हो चुका था। काम सीखने के बाद कुड़ियम ने अपने साथ गांव के चार और मनरेगा श्रमिकों को जोड़कर समूह बनाया और पेड़ों के रखरखाव के साथ कीटपालन और कोसा फल उत्पादन का काम शुरू किया।
बच्चों की हो रही पढ़ाई
कोसा फल के उत्पादन से जुड़ने के बाद कुड़ियाम कहते हैं अब अपने परिवार का भरण-पोषण अच्छे से कर पा रहा हूं। मेरे तीन बच्चे हैं, जिनकी पढ़ाई अब अच्छी तरह हो पा रही है। वह कहते हैं कि खेती किसानी के साथ कुछ और करने का भी मन था। रेशम कीटपालन के रूप में मुझे रोजी-रोटी का नया साधन मिला।










