छत्तीसगढ के नक्सल प्रभावित नारायणपुर के अबूझमाड के ओरछा से 26 किलोमीटर दूर कुडमेल पंचायत के पहुंच विहीन 20 गांवों के लोगों ने शासन से विकास की आस छोड दी है। शासन लाख दावे करे कि अबूझमाड का विकास हो रहा है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि विकास केवल शासन की फाइलों में हो रहा है। गांववालों ने रोज की समस्या का देखते हुए नदी पर देसी जुगाड़ से बांस और कंकड़ पत्थर से पुलिया का निर्माण कर डाला। इसके लिए ग्रामीणों ने लकडी के मोटे तने और बांस की चटाई का इस्तेमाल किया है। इस पुलिया में पिलर के लिए बांस का गोल घेरा बनाकर उसे कंकड़-पत्थर से भर दिया।
यह पुलिया ढोढरबेड़ा और कुडमेल के बीच में बना है। इस जुगाड का पुल बनने से अबूझमाड के कुडमेल, ही फुरपारा, हरवेल, धोबे डोंगरीपारा पद मेटा, करान्गुल, तोयामेटा, तालबेडा, लंका, ढोढरबेड़ा, करांगुल, पदमेटा, तालाबेड़ा आदि गांवों के लोग अब आसानी से राशन बाजार और जरूरत का सामान लेने मंगलवार को निकलते हैं और दूसरे दिन साप्ताहिक बाजार बुधवार को करके रात्रि विश्राम ओरछा में करते हैं और सुबह गुरुवार को निकलते हैं और शाम को 7:00 बजे के आसपास अपने घर पहुंचते हैं जो गांव के लोग ओरछा आते हैं।
गौर हो कि उस पुल के उस पार लगभग 15 से 20 गांव है जो अत्यंत ही पहुंच विहीन है और नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण वहां केवल स्वास्थ्य अमला और शिक्षक ही पहुंच पाते हैं, बाकी सभी विभाग के लिए पहुंच से बाहर है। इस क्षेत्र में पंचायत के लोग भी जाने से कतराते हैं। पहुंच मार्ग जाटलुर तक बना है इस कारण वहां तक पहुंचना पैदल ही किया जा सकता है।
खास बात यह है कि आला अधिकारी नारायणपुर में ही रहकर ओरछा का कार्य संपादन कर रहे हैं। नतीजा यह है कि ग्रामीण अपनी समस्या उन तक नहीं पहुंचा पा रहा है और उनकी समस्या जस की तस बनी रहती है। वहीं अफसर नक्सली समस्या का बात कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं। ऐसे में अबूझमाड़ का विकास हो रहा है कहना बेमानी होगी।
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