Ekhabri धर्मदर्शन,पूनम ऋतु सेन। बस्तर के आदिवासियों की अभूतपूर्व भागीदारी का प्रतिफल है कि बस्तर दशहरा अब अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान स्थापित कर चुका है। मैसूर के दशहरे के जैसा ही प्रसिद्ध बस्तर का दशहरा बस्तर अंचल में मनाए जाने वाले पारंपरिक त्योहारों में सबसे बड़ा त्यौहार है। इस दशहरे को और भी आकर्षक बनाते हैं यहाँ के लोगों के द्वारा मनाये जाने वाले लोक रस्मों का क्रमवार घटनाक्रम।
पिछले पोस्ट में हमने काछिनगादी जैसे ह्रदय स्पर्शी प्रथा के बारे में जाना था। इसी कड़ी में हम आज रैला पूजा और जोगी बिठाई के रस्म के बारे में चर्चा करेंगे।
रैला पूजा
बस्तर दशहरे में अनेक परंपरागत रस्में निभाई जाती हैं इन्हीं परंपरागत रस्मों में काछीन गादी की प्रथा के पश्चात रैला पूजा की रस्म निभाई जाती है। यह आंचलिक नवरात्र का प्रथम रस्म है। इस दिन मिरगान जाति की महिलाएं रैला पूजा करती हैं। इसके अंतर्गत आश्विन शुक्ल पक्ष प्रथमा से प्रारंभ कर नवमी तक आंचलिक मंदिरों में कलश की स्थापना की जाती है ये मंदिर है- दंतेश्वरी माई, मावली माता व कंकालिन देवी का मंदिर। कलश स्थापना के साथ-साथ ब्राह्मणों के द्वारा यहां पूर्ण विधि-विधान से पूजा संपन्न कराई जाती है।
बस्तर दशहरा के परंपरागत रस्मों में अगला चरण जोगी बिठाई का होता है। शारदीय नवरात्र प्रारंभ होने वाले दिन सिरासार भवन में जोगी बिठाई की प्रथा पूरी की जाती है। कहा जाता है कि एक बार कोई आदिवासी दशहरा निर्विघ्न संपन्न होने की कामना लेकर अपने ढंग से योग साधना में बैठ गया था तभी से दशहरे के अवसर पर जोगी बिठाने की प्रथा चल पड़ी है।
जोगी बिठाने के लिए सिरासार भवन के मध्य भाग में एक आदमी के समा जाने लायक एक कुंड जैसा बना हुआ है। इसके अंदर आमाबाल एवं पराली गांव के निश्चित घरों के वंशानुगत हलवा समुदाय के व्यक्ति लगातार 9 दिन योगासन में बैठा करते हैं। इस गड्ढे के अंदर बैठकर लगातार 9 दिनों तक तप या योग साधना में बैठा रहना भी किसी चुनौती से कम नहीं है। हल्बा समुदाय के लोग यह कार्य बड़े ही आस्था और श्रद्धा के साथ पूर्ण करते हैं और बस्तर दशहरे के ठीक तरह से सम्पन्न होने की कामना करते हैं।
जोगी बिठाई के समय पहले एक बकरा और 7 मांगुर मछली काटने का रिवाज था, परन्तु अब बकरा नहीं काटा जाता, केवल मांगुर मछली ही काटे जातें हैं।
इस रस्म के बाद से बस्तर दशहरा अपने पूर्ण रंग के साथ शुरू हो जाता है। हमारी टीम की कोशिश रहेगी कि अपने पाठकों के लिए ऐसे ही रोचक किस्से लेकर आते रहें और रोज नयी जानकारी से उन्हें अवगत कराएं। आगामी रस्मों को विस्तार से जानने के लिए Ekhabri.com से जुड़े रहें।
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