देवी के कई शक्ति पीठ हैं जिनकी अपनी अलग किदवंती और महिमा है। इसमें से एक है रतनपुर स्थित मां महामाया मंदिर। छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर जिले में रतनपुर नगर में स्थित है। यह स्मारक छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा संरक्षित है। यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है।यह मंदिर लगभग १२वीं शताब्दी में निर्मित माना जाता है। मंदिर के अंदर महामाया माता का मंदिर है। वैसे तो सालभर यहां भक्तों का तांता लगा रहता है लेकिन मां महमाया देवी मंदिर के लिए नवरात्रों में मुख्य उत्सव, विशेष पूजा-अर्चना एवं देवी के अभिषेक का आयोजन किया जाता है।
रतनपुर महामाया मंदिर को संरक्षित करने के लिए छत्तीसगढ़ पर्यटन विभाग लगातार यहां नए नए काम कर रहा है। पहली बार पर्यटन मंडल का अध्यक्ष भी बिलासपुर से है , उनकी निगरानी में काम चल रहा है। रतनपुर मंदिर जाने के लिए पहले बिलासपुर जाना पड़ेगा, बिलासपुर स मात्र कुछ किमी की दूरी में रतनपुर का भव्य मंदिर है। यहां पहुचने के लिए बस, ट्रेन और कैब सबसे अच्छा और सस्ता जरिया है।
मंदिर से जुड़ी पौराणिक जानकारी
लगभग नौ वर्ष प्राचीन महामाया देवी का दिव्य एवं भव्य मंदिर दर्शनीय है । इसका निर्माण राजा रत्नदेव प्रथम द्वारा ग्यारहवी शताबदी में कराया गया था । 1045 पई. में राजा रत्नदेव प्रथम मणिपुर नामक गाँव में शिकार के लिए आये थे, जहा रात्रि विश्राम उन्होंने एक वटवृक्ष पर किया। अर्ध रात्रि में जब राजा की आंखे खुली, तब उन्होंने वटवृक्ष के नीचे अलौकिक प्रकाश देखा। यह देखकर चमत्कृत हो गई की वह आदिशक्ति श्री महामाया देवी की सभा लगी हुई है। इसे देखकर वे अपनी चेतना खो बैठे।
सुबह होने पर वे अपनी राजधानी तुम्मान खोल लौट गये और रतनपुर को अपनी राजधानी बनाने का निर्णय लिया गया तथा 1050 ई. में श्री महामाया देवी का भव्य मंदिर निर्मित कराया गया। मंदिर के भीतर महाकाली,महासरस्वती और महालक्ष्मी स्वरुप देवी की प्रतिमाए विराजमान है। मान्यता है कि इस मंदिर में यंत्र-मंत्र का केंद्र रहा होगा। रतनपुर में देवी सती का दाहिना स्कंद गिरा था। भगवन शिव ने स्वयं आविर्भूत होकर उसे कौमारी शक्ति पीठ का नाम दिया था । जिसके कारण माँ के दर्शन से कुंवारी कन्याओ को सौभाग्य की प्राप्ति होती है। नवरात्री पर्व पर यहाँ की छटा दर्शनीय होती है। इस अवसर पर श्रद्धालूओं द्वारा यहाँ हजारो की संख्या में मनोकामना ज्योति कलश प्रज्जवलित किये जाते है ।
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