Google Analytics Meta Pixel नवीन तकनीक से 12 सौ किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बढ़ा मत्स्य उत्पादन - Ekhabri.com

नवीन तकनीक से 12 सौ किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बढ़ा मत्स्य उत्पादन


दुर्ग। मत्स्य पालन वर्तमान में एक लोकप्रिय व्यवसाय के रूप में उभर रहा है और जिले की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बना रहा है। आज जिले में मत्स्य बीज के लिए 10 हैचरी स्थल जिससे अन्य राज्य जैसे पश्चिम बंगाल जिसपर हम मत्स्य बीज के लिए हम निर्भर रहते थे। उनसे हमारी निर्भरता नगण्य हो गई है और जिले में ही सस्ते दरों पर मछली बीज प्राप्त हो रहे हैं जिनका बाहरी मार्केट में विक्रय भी किया जा रहा है। मत्स्य विभाग के द्वारा संचालित नवीन योजनाओं बायोफ्लोप फिश फार्मिंग, आरएएस सिस्टम, नील क्रांति योजना और जिले में निर्मित निजी क्षेत्र के तालाबों से आज जिले में मछली की उत्पादन क्षमता 2800 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 4000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई है अर्थात प्रतिदिन 1200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई है। जिले में हाइजेनिक मार्केट भी बनायें गये है, जिसमें थोक और फूटकर दूकानदारों के लिए सुव्यवस्थित व्यवस्था की गई है। आज जिले से प्रतिदिन 12 मेट्रिक टन मछलियां प्रदेश के अन्य जिलों जैसे रायपुर, राजनांदगांव, बेमेतरा, बालोद और कवर्धा व देश के विभिन्न प्रदेश जैसे मध्यप्रदेश, उड़ीसा में भी भेजा जा रहा है।


जिले के युवा और किसान आज बड़े स्तर पर मत्स्य पालन का कार्य कर रहे है। शासन की मंशानुरूप गौठानों के अंदर भी मछली पालन का कार्य किया जा रहा है। जिसके तहत दुर्ग जिले में 18 गौठानों में मछली पालन का कार्य किया जा रहा है और आने वाले समय में चंदखुरी का गौठान भी मछली पालन के लिए तैयार हो रहा है। अपेक्षाकृत कम लागत में भी मत्स्य पालन से अधिक आय प्राप्त होती है इसलिए मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विभाग में विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही है। कृषको द्वारा मौसमी तालाबों का उपयोग कर जिले में 102 सहकारी समितियां और 56 मछुवा समूह मछली पालन के लिए पंजीकृत है। वर्तमान में 83 मछली पालन के लिए इच्छुक व्यक्तियों को केसीसी से लाभान्वित किया जा रहा है। इसके साथ-साथ वर्तमान में खनिज मद और विभागीय अभिसरण से मनरेगा के तहत 1000 डबरियों का निर्माण कार्य प्रगति पर है। जिसमें शीघ्र ही मछली पालन का कार्य किया जाएगा।

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हैचरी का निर्माण कर सस्ते दर पर उपलब्ध कराई जा रही है मछली बीज – वर्तमान में जिले में मत्स्य बीज उत्पादन के लिए 10 हैचरी स्थल है जिसमें एक मत्स्य विभाग, एक मत्स्य महासंघ और आठ निजी क्षेत्र द्वारा संचालिल किये जाते है। जिले के मत्स्य पालकों को इन हैचरी के द्वारा सस्ते दरों पर मत्स्य बीज उपलब्ध कराये जा रहे है। इससे पहले मत्स्य बीज के लिए ज्यादा कर मत्स्य पालक पश्चिम बंगाल पर निर्भर थे परंतु जिले में हैचरी के लिए लिये गये कदमों से अब ये मछली बीज जिले में ही प्राप्त हो रहे है। हैचरी में एक से डेढ़ महीने में मत्स्य बीज तैयार हो जाते है। इसके लिए स्पान भी तैयार किया जा रहा है। वर्तमान में मत्स्य पालकों को लगभग 250 रुपये प्रति किलो मत्स्य बीज की दर से मत्स्य बीज उपलब्ध हो रहा है। जिले में लगभग मछली बीज उत्पादन में अग्रणी और आत्मनिर्भर है।

3 हजार 282 तालाब, 101 जलाशय और 95 डबरियों में पल रही है मछलियाँ- जिले में ग्रामीण तालाबों की संख्या 3165, जलक्षेत्र 4397.244 हेक्टेयर एवं सिंचाई जलाशयों की संख्या 101, जलक्षेत्र 2971.208 हेक्टेयर तथा मनरेगा से निर्मित डबरियों की संख्या 95 है। इसके अलावा विभिन्न योजनाओं के तहत् क्षेत्र में 117 निजी तालाब हैं, जिसका जलक्षेत्र 100 हेक्टेयर हैं, जिसमें मत्स्य पालन का कार्य किया जा रहा है। योजनाओं के संचालन से मछली पालन के क्षेत्र में विस्तार हुआ है, वही जल संरक्षण को भी बढ़ावा मिला है।


हाईजेनिक मार्केट के साथ-साथ सामान्य खुदरा मछली बाजार की विभिन्न स्थलों पर व्यवस्था- जिले में मत्स्य विक्रय हेतु खुदरा मछली बाजार की पर्याप्त व्यवस्था है। जिसमें मत्स्य कृषकों द्वारा उत्पादित मछलियों और निजी मत्स्य व्यवसायियों के लिए भी सुव्यवस्थित व्यवस्था की गई है। जिले में इंदिरा मार्केट दुर्ग, रूआबांधा, सुपेला, हुडको, सेक्टर-06 इ मार्केट, सी मार्केट, केम्प, पावर हाउस और इसके अतिरिक्त हर विकासखंड में मार्केट की व्यवस्था है। जिले में हाइजेनिक मछली मार्केट की स्थापना भी की गई है। जिसमें विकासखण्ड दुर्ग में एक हाइजेनिक मार्केट का निर्माण किया गया है। जिसमें 32 थोक एवं 56 फूटकर दुकान निर्मित किये गये है।

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वर्तमान में जिले का वार्षिक मत्स्य उत्पादन 30 हजार 700 मेट्रिक टन है, जिसमें से 29 हजार 588 मेट्रिक टन ग्रामीण तालाबों से, नदीयों से 140 मेट्रिक टन, सिंचाई जलाशयों से 458 मेट्रिक टन तथा निजी ग्रामीण तालाबों से 314 मेट्रिक टन एवं बायोफ्लॉक एवं रिसर्कुलेटिंग एक्वा सिस्टम एवं खदान में केज कल्चर से 200 मेट्रिक टन वार्षिक मत्स्य उत्पादन हो रहा है। जिले में उत्पादित मछलियों को लोकल मार्केट भी प्राप्त हो रहा है। साथ ही अन्य राज्यों जैसे पश्चिम बंगला, उड़ीसा, मध्यप्रदेश से मार्केट प्राप्त हो रहा है। आस-पास के जिलों और अन्य राज्यों में प्रतिदिन 12 मैट्रिक टन के आस-पास मछलियों को निर्यात किया जाता है।


जिले में मछली की खपत का कारण- मछली में पोषक तत्वों की मात्रा पर्याप्त होती है और ये सुपाच्य भी होता है। जिसके कारण इसकी मांग लगातार बनी रहती है। जिले के कुल आबादी लगभग 17 लाख 21 हजार 948 है। जिसमें जिले के निवासियों की एक बड़ी संख्या मछली का सेवन करती है। जो कि लगभग 65 प्रतिशत अर्थात 11 लाख के समीप है।
जिले में मेजर क्राप – कतला, रोहू, मृगल, कामनकार्प, ग्रासकार्प, सिलवरकार्प, लोकल मेजर क्राप – पडीन, संवल, सिंघाड, बाम, नायल तेलापिया, टेंगना, पंकास इत्यादि।
लोकल माइनर क्राप – सारंगी, कोतरी, मोहराली, बामी, खोक्सी, रूधनी, खेरा इत्यादि मछलियां कृषकों द्वारा उत्पादित की जाती है।

मत्स्य विभाग कि उपसंचालक सुधादास ने बताया कि जिले वासियों कि सामाजिक और आर्थिक स्थिति को बदलने के लिए मत्स्य पालन बहुत ही अच्छा विकल्प है। मत्स्य पालन गतिविधियों को प्रोत्साहन और विस्तार देने के लिए विभाग मत्स्य बीज, नाव, जाल व मछली आहार का वितरण मत्स्य पालकों को करता हैं और हितग्राहियों को प्रशिक्षण भी प्रदान कर रहा है। इसके अलावा शासन की विभिन्न योजनाओं को आमजन तक पहुंचाने का कार्य भी विभाग कर रहा है। मत्स्य पालकों और मछुवारों को संस्थागत योजनाओं से लगातार लाभ पहुंचाया जा रहा है।

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