Google Analytics Meta Pixel अफीम की खेती से किसानों को लाखों-करोड़ों का मुनाफा - Ekhabri.com

अफीम की खेती से किसानों को लाखों-करोड़ों का मुनाफा

अफीम की खेती पहले भारत के कुछ ही हिस्से में की जाती थी, लेकिन धीरे-धीरे इस रकवा बढऩे लगा है और कई प्रदेशों में इस नशा-दवा की खेती जमकर की जा रही है। वैसे बहुत कम किसान की इसको अपना रहे हैं पर जो इसकी खेती कर रहे हैं वे लाखों-करोड़ों भी कमा रहे हैं। ऐसे ही मध्य प्रदेश के प्रगतिशील किसान भागवत शर्मा अफीम की खेती करते हैं। उन्हों ने बताया कि अफीम की खेती कर वे लाखों रुपए की आय अर्जित कर रहे हैं। साथ ही इन्होंने यह खुलासा किया कि इसकी खेती करते वक्त किन बातों का ख़ासा ध्यान रखना चाहिए ताकि किसानों को भविष्य में तगड़ा मुनाफा मिल सके। चार दिन मेहनत करने के बाद थकना नहीं चाहिए क्योंकि बीज को फसल बनने में समय लगता है। इस तथ्य के उदाहरण मध्य प्रदेश के रहने वाले किसान भागवत शर्मा हैं जो प्याज, सोयाबीन और अफीम की खेती करते हैं। इन्होंने बताया कि ओपियम की खेती में शिशु की तरह देखभाल लगती है जिसका फल फसल पकने के बाद मिलता है। शर्मा बताते हैं कि उन्होंने सोयाबीन की खेती इसलिए चुनी क्योंकि यह खरीफ की फसल है जिसे मारवा और राजस्थान के कई किसान पसंद करते हैं व खाद्य सुरक्षा में भी इसका अहम योगदान है। दूसरी ओर, प्याज एक नकदी फसल है जिसकी बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। शर्मा मानसून के मौसम में सोयाबीन की रोपाई करते हैं और प्याज के लिए अपनी नर्सरी तैयार करते हैं जिसे बारिश होते ही खेतों में लगा दिया जाता है। अगर बारिश नहीं होती है, तो यह सिंचाई के तरीकों को अपनाते हैं। शर्मा किसानों को सुझाव देते हैं कि सोयाबीन की खेती के लिए प्रमाणित बीजों का उपयोग करना बेहतर है क्योंकि सोयाबीन की अंकुरण क्षमता तुलनात्मक रूप से कम होती है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि उत्पादन सीधे अंकुरण क्षमता पर निर्भर करता है। शर्मा खुद प्याज के बीज तैयार करते हैं जिन्हें पौध के बाद खेतों में लगाया जाता है।
अफीम की खेती का लाइसेंस

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दिलचस्प बात यह है कि शर्मा ने खुलासा किया कि आखिर अफीम की खेती कैसे की जाती है। एनडीपीएस अधिनियम, 1985 की धारा 8 के तहत भारत में अफीम की खेती प्रतिबंधित है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर राज्यों में एनडीपीएस नियम, 1985 के नियम 8 के तहत केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो से लाइसेंस प्राप्त करने के बाद ही किसान इसका अभ्यास कर सकते हैं।
केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो का लाइसेंस प्राप्त करने वाले किसान अक्टूबर के अंतिम सप्ताह और नवंबर के पहले सप्ताह में फसल की बुवाई करते हैं।शर्मा ने बताया कि खेत तैयार कर बीज क्यारी बनाई जाती है. इसके बाद मिट्टी में डीएपी और उर्वरकों की आपूर्ति की जाती है. अफीम के बीज बहुत छोटे होते हैं और पानी की मात्रा का बहुत ध्यान रखना पड़ता है. शर्मा कहते हैं कि अफीम की खेती के लिए उतनी ही देखभाल की आवश्यकता होती है जितनी की बच्चे को पालने के लिए होती है। शर्मा आगे कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण एक किसान के सामने कई तरह की कठिनाइयां आती हैं. ऐसे में कीटनाशकों के उपयोग के बिना कोई भी खेती करना असंभव है और एक किसान को यह जांचने के लिए अपने खेत का कम से कम दिन में एक चक्कर लगाना पड़ता है।

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