रायपुर, पूनम ऋतु सेन। रायपुर से लगभग 37 किलोमीटर दूर स्थित आरंग महानदी के तट पर बसा एक प्राचीन नगर है यहां चारों तरफ पुरातात्विक सामग्रियां बिखरी पड़ी हैं इस कारण इस छोटे से नगर को मंदिरों की नगरी कहा जाता है।
यहां स्थित भव्य प्राचीन मंदिर और सैकड़ों शिवलिंग पुरा इतिहास को अपने में समेटे हुए हैं।

कलचुरी स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना11वीं से 12वीं शताब्दी में बना भांडदेवल के नाम से विख्यात प्राचीन मंदिर जैन धर्म को समर्पित है। इसके संबंध में ऐसी मान्यता है कि यहां भाई-बहन एक साथ नहीं जाते हैं। खंडित हो चुके इस मंदिर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने अपने संरक्षण में रखा है। यहां पूजा-अर्चना नहीं होती है। अलबत्ता दूर-दूर से लोग इसकी स्थापत्य कला और नक्काशी को देखने आते हैं।

भांड का अर्थ बर्तन व देवल का अर्थ मंदिर है। इन दोनों शब्दों से मिलकर बना है भांडदेवल। यह नगर का सबसे बड़ा और प्राचीन मंदिर है। पत्थरों से निर्मित मंदिर की अदभुत स्थापत्य कला पर्यटकों का बरबस ही मन मोह लेती है। इसके अद्भुत वास्तुशिल्प के कारण आरंग की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है। यह ऊंची पश्चिमाभिमुख ताराकृति, पंचरत्न एवं भूमिज शैली में निर्मित है।
इस मंदिर का मंडप नष्ट हो चुका है बाहरी और भीतरी दीवारों पर नृत्य एवं संगीत का दृश्य चित्रित है जहां समुद्र मंथन का दृश्य बेहद प्रभावी दिखाई देता है। भांडदेवल मंदिर के गर्भगृह में तीन तीर्थंकरो की कार्योत्सर्ग मुद्रा वाली सुंदर प्रतिमाएं अधिष्ठित हैं। काले पत्थरों से निर्मित आदमकद इन मूर्तियों का आकर्षण पर्यटकों को आकर्षित करता है। पश्चिमोन्मुखी यह मंदिर ऊंची जगती पर निर्मित है। इसके आधार विन्यास में पंचस्थाकार है । नागर शैली में निर्मित इस मंदिर के मंडप एवं मुखमंडप का आधार से ऊपर का भाग विनष्ट हो चुका है।
गर्भ ग्रह का सतह द्वार से तीन सीढियां गहरी हैं, यहां तीन जैन तीर्थंकर- शांतिनाथ, श्रेयांसनाथ एवं अनंत नाथ की काले पत्थर से बनी प्रतिमाएं 6 फीट ऊंची पीठिका पर स्थापित है। मान्यता है कि इस मंदिर में भाई बहन एक साथ प्रवेश नहीं कर सकते।











