धर्मदर्शन,पूनम ऋतु सेन। शारदीय नवरात्र का पर्व 7 अक्टूबर से प्रारम्भ हो चुका है, 9 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में मां दुर्गा की भक्ति व आराधना किया जाता है। छत्तीसगढ़ राज्य में देवी उपासना का प्रचलन प्राचीन काल से ही दिखायी देता है। यहां राज्य के हर कोने में प्रमुख देवी मंदिर और उनसे जुड़े इतिहास भक्तों और पर्यटकों को अपनी ओर सहज ही खींच कर ले आते हैं।
नवरात्र के प्रथम दिन आज बिलासपुर जिले के रतनपुर में स्थित महामाया मंदिर की बारे में जानते हैं-
बिलासपुर- कोरबा मुख्यमार्ग पर 25 कि.मी. पर स्थित आदिशक्ति महामाया देवी की पवित्र पौराणिक नगरी रतनपुर का प्राचीन एवं गौरवशाली इतिहास है। त्रिपुरी के कलचुरियों ने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाकर दीर्घकाल तक छत्तीसगढ़ में शासन किया। इसे चतुर्युगी नगरी भी कहा जाता है, जिसका तात्पर्य है कि इसका अस्तित्व चारों युगों में विद्यमान रहा है। राजा रत्नदेव प्रथम ने 11वीं शताब्दी में रतनपुर के नाम से इस स्थल को अपनी राजधानी बनाकर साम्राज्य बसाया।
माँ महामाया मंदिर का निर्माण कैसे हुआ?
श्री आदिशक्ति मां महामाया देवी: लगभग नौ सौ वर्ष प्राचीन महामाया देवी का दिव्य एवं भव्य मंदिर दर्शनीय है। इसका निर्माण राजा रत्नदेव प्रथम द्वारा 11वीं शताब्दी में कराया गया था।
1045 ई. में राजा रत्नदेव प्रथम मणिपुर नामक गांव में शिकार के लिए आये थे, जहां रात्रि विश्राम उन्होंने एक वटवृक्ष पर किया । अर्ध रात्रि में जब राजा की आंखे खुली, तब उन्होंने वट वृक्ष के नीचे अलौकिक प्रकाश देखा। यह देखकर चमत्कृत हो गये कि वहां आदिशक्ति श्री महामाया देवी की सभा लगी हुई है। इसे देखकर वे अपनी चेतना खो बैठे। सुबह होने पर वे अपनी राजधानी तुम्मान लौट गये और रतनपुर को अपनी राजधानी बनाने का निर्णय लिया तथा 1050ई. में श्री महामाया देवी का भव्य मंदिर निर्मित कराया।
एक अभिलेख के अनुसार मंदिर के आगे सभामंडप का निर्माण कलचुरी राजा बहारसाय द्वारा करवाया गया था। यह मंदिर देश के 51 शकितपीठों में से एक है। नागर शैली में निर्मित इस मंदिर का मंडप 16 स्तंभों पर टिका है।
मंदिर के भीतर महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी स्वरूपा देवी की प्रतिमाएं विराजमान हैं। मान्यता है कि इस मंदिर में यंत्र-मंत्र का केन्द्र रहा होगा। रतनपुर में देवी सती का दाहिना स्कंध गिरा था। भगवान शिव ने स्वयं आविर्भूत होकर उसे कौमारी शक्ति पीठ का नाम दिया था। जिसके कारण मां के दर्शन से कुंवारी कन्याओं को सौभाग्य की प्राप्ति होती है। नवरात्रि पर्व पर यहां की छटा दर्शनीय होती है। इस अवसर पर श्रद्धालुओं द्वारा यहां हजारों की संख्या में मनोकामना ज्योति कलश प्रज्जवलित किये जाते हैं।
यह मंदिर वर्तमान में छत्तीसगढ़ शासन द्वारा संरक्षित स्मारक है।
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