Google Analytics Meta Pixel कही-सुनी ( 20 सितंबर ): मंच के पीछे की कहानियाँ- राजनीति,प्रशासन और राजनीतिक दलों की - Ekhabri.com

कही-सुनी ( 20 सितंबर ): मंच के पीछे की कहानियाँ- राजनीति,प्रशासन और राजनीतिक दलों की

हास्य रस में बुनी हुई एक हल्की -फुल्की अन्दाज में- जो राजनीति, अफसर साहब के आसपास की गलियों से होते हुए पाठकों तक पहुचीं।

रवि भोई (प्रबंध संपादक समवेत सृजन एवं स्वतंत्र पत्रकार)


ट्विटर पर छत्तीसगढ़ का प्रशासन
सोशल मीडिया क्या आ गया, सब कुछ खुलापन हो गया है। सही भी है कि सोशल मीडिया में आमलोग खुलकर अपनी बातें कह रहे हैं, तो भला शासन -प्रशासन में बैठे लोग अपने -आपको को कैसे रोक सकते हैं ? रमन राज में छत्तीसगढ़ के एक अधिकारी ने भाजपा के एक विचारक को लेकर सोशल मीडिया पर टिप्पणी की थी, जिस पर हंगामा और जवाब-तलब भी हुआ था । लेकिन लगता है आजकल तो राज्य के अफसरों का सोशल मीडिया,खासकर ट्विटर पर एक्टिव रहना पैशन और फैशन बन गया है। कुछ अफसर साइकिल चलाते ट्विटर अकाउंट पर दिखते हैं , तो कुछ बाजार जाकर सब्जी खरीदने, गार्डन में सैर-सपाटे व योग से लेकर फ्रेंच कट स्टाइल को ट्वीट कर लाइक और शेयर करने में जुटे दिखते हैं। कुछ अफसर सेलब्रिटी को जन्मदिन की बधाई देकर फॉलोअर बढ़ाने की स्पर्धा में नजर आते हैं। कहते हैं पहले के अफसर दौरे- लोगों से मेल-मुलाक़ात कर लोकसेवक की भूमिका निभाते थे और उनका मकसद शासन की नीतियों को हर हाल में जनता तक पहुँचाना होता था, पर ट्वीट के खेल से लोगों को ऐसा लगने लगा है कि छत्तीसगढ़ का प्रशासन तो ट्विटर पर ही चल रहा है। एक जमाना था कि नीति- निर्धारक अफसर कोई भी बात सार्वजनिक रूप से कहने से बचते थे और उन्हें सर्विस रूल अनुमति भी नहीं देता था, लेकिन लगता है समय के साथ सब कुछ बदल गया है। शासन के फैसले और नीतियों को सोशल मीडिया के जरिए जनता तक पहुँचाना तो सराहनीय है, लेकिन सरकारी सेवक अपना बहुमूल्य समय सोशल मीडिया में जाया करते दिखेंगे तो फिर सरकारी योजनाएं भी सोशल मीडिया से बाहर नहीं निकल पाएंगी। योजनाएं धरातल पर नहीं उतरेंगी तो फिर विकास क्या होगा। अफसर तो किसी अच्छे शासन के बेहतर कलपुर्जे होते हैं। कलपुर्जे ही काम बंद कर दें तो विकास की गाडी चलेगी कैसी ?

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दिल्ली में पुनिया का बंगला छत्तीसगढ़ की सांसद को
कांग्रेस महासचिव और छत्तीसगढ़ प्रभारी पीएल पुनिया इस साल नवंबर में राज्यसभा से रिटायर हो जायेंगे। पीएल पुनिया उत्तरप्रदेश से कांग्रेस के कोटे से राज्यसभा सांसद हैं। उत्तरप्रदेश में कांग्रेस के अभी मात्र सात विधायक हैं, ऐसे में वहां से पीएल पुनिया के दोबारा चुने जाने की कोई उम्मीद नहीं है और कांग्रेस के बहुमत वाले राज्यों में नवंबर में कोई सीट खाली नहीं हो रही है। इस वजह से 25 नवंबर 2020 के बाद पीएल पुनिया किसी सदन के सदस्य नहीं रह जायेंगे। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव के नाते और केंद्र की राजनीति के लिए पीएल पुनिया को दिल्ली में रहना जरुरी है। किसी सदन के सदस्य न होने पर शहरी विकास मंत्रालय तत्काल बंगला खाली करवा देगा। इसकी तोड़ के लिए पूर्व ब्यूरोक्रेट पुनिया ने छत्तीसगढ़ की एक महिला सांसद का सहारा ले लिया है। कहते हैं पुनिया के रिटायर होने की प्रत्याशा में गुरुद्वारा रकाबगंज वाला बंगला, जिसमें अभी पीएल पुनिया रह रहे हैं , वह बंगला महिला सांसद के नाम पर आबंटित कर दिया गया है। पहली बार के सांसद को दिल्ली में इतने बड़े बंगले के आबंटन पर लोग दांतों तले उंगुली दबा रहे हैं। पीएल पुनिया का एक निज सचिव भी महिला सांसद के स्टाफ में फिट हो गया है। इसे ही कहते हैं दूर की सोच।


प्रियंका नहीं मिलीं नेताजी से
कहते हैं छत्तीसगढ़ के एक बड़े नेता सितंबर के पहले हफ्ते में कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी से मिलने गए, वे नहीं मिलीं, तो तामझाम छोड़कर अकेले कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा से मिलने चले गए। नेताजी को प्रियंका गाँधी के नए आवास का पता मालूम नहीं था। राज्य के कुछ अफसरों की मदद से वे प्रियंका के गुरुग्राम स्थित आवास पर पहुंचे, लेकिन प्रियंका ने बिना अपॉइंटमेंट के मिलने से इंकार कर दिया और साथ ही अपने स्टाफ के माध्यम से ताकीद भी करवा दिया कि भविष्य में मुलाकात के लिए अपॉइंटमेंट लेकर ही आएं।


मरवाही के लिए उधेड़बुन में भाजपा
मरवाही उपचुनाव कब होगा, यह तो अभी तय नहीं है , लेकिन राजनीतिक पार्टियां वहां ऊर्जा लगाना शुरू कर दिया है। मरवाही में जीत के लिए कांग्रेस जिस तरह से विकास के दरवाजे खोल रही है, ऐसे में भाजपा को चिंता होने लगी है कि कांग्रेस के सामने वह किस तरह टिक पाएगी और चुनाव में धन कौन लगाएगा ? 15 साल सत्ता में रहने वाली भाजपा ने किसी तरह दंतेवाड़ा और चित्रकोट उपचुनाव को तो निपटा लिया। कहते हैं भाजपा मरवाही के लिए अपने बलबूते अधिक से अधिक धन खर्च कर सकने वाले प्रत्याशी की तलाश कर रही है। देखते है कौन मिलता है, पर एक डाक्टर के नाम की चर्चा है।

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स्वास्थ्य विभाग में खेल मीटिंग-मीटिंग का
छत्तीसगढ़ में कोरोना संक्रमण अकल्पनीय होता चला जा रहा है। मौत का आंकड़ा भी तेजी से बढ़ रहा है। सरकारी अस्पतालों में बेड और उपकरण कम पड़ते जा रहे हैं तो कोरोना के इलाज के लिए अधिकृत निजी अस्पताल मरीजों की मजबूरी में अपना फायदा तलाश रहे हैं। कहते हैं कोरोना को मात देने के लिए स्वास्थ्य विभाग के आला अफसर सुबह से रात तक मीटिंग कर रहे हैं , लेकिन स्थिति सुधरने की जगह विस्फोटक होती जा रही है। राज्य में 18 सितंबर को एक दिन में 3800 मरीजों का पॉजिटिव आना मायने रखता है। रोज-रोज की मीटिंग से दुखी लोगों का कहना है – फील्ड में जायं , तब न काम करें।


रिटायर्ड साहब की पूछ-परख
चर्चा है कि सरकार कोर्ट के मामलों में आजकल एक पूर्व मुख्य सचिव की सलाह लेने लगी है। पूर्व मुख्य सचिव की सलाह से कोर्ट के मामलों में कुछ सफलता भी मिल रही है। इस काम से सरकार भी खुश और साहब भी खुश। इस कारण साहब सरकार के पसंदीदा भी हो गए हैं।उनकी पूछ-परख भी बढ़ गई है। रिटायर्ड मुख्य सचिव साहब से कांग्रेस सरकार कुछ दिनों पहले खफा हो गई थी और उन्हें दरकिनार कर दिया था, लेकिन जब उनकी उपयोगिता समझ में आई, तो उन्हें ससम्मान नवाजने का काम कर दिया। कहते न सब कुछ समय कराता है।


सुरजेवाला राग वाले डीएफओ
कहते हैं राजधानी रायपुर से सटे एक जिले के डीएफओ साहब अपने को कांग्रेस के महासचिव और प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला का रिश्तेदार बताते हैं। भारतीय वन सेवा में सीधी भर्ती वाले यह अधिकारी करीब चार साल पहले ही लोक सेवक चुने गए हैं। सुनने में आया है कि अधिकारी महोदय स्वयं ही कांग्रेस नेता के रिश्तेदार होने का बखान करते हैं और यह भी कहते नहीं अघाते कि उनकी पोस्टिंग कांग्रेस नेता ने ही करवाई है। कहते हैं डीएफओ साहब दफ्तर कब आते हैं किसी को पता नहीं होता। आजकल सरकार ने कैम्पा फंड से फील्ड के अफसरों चमचमाती नई गाड़ियां दे दी है, ऐसे में तो उनके और “पौ बारह हो गए हैं।“

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यादव नेता मायूस
कांग्रेस हाईकमान ने पीएल पुनिया को छत्तीसगढ़ का प्रभारी महासचिव बना दिया है, लेकिन प्रभारी सचिव कौन होगा अभी तय नहीं है। अभी तक चंदन यादव छत्तीसगढ़ के प्रभारी सचिव थे। कहा जाता है कि 2018 के विधानसभा चुनाव में यादव समाज के लोगों को प्रत्याशी बनवाने में चंदन की बड़ी भूमिका थी। देवेंद्र यादव, द्वारिकाधीश यादव और रामकुमार यादव अभी कांग्रेस के विधायक हैं। कहा जाता है कि सरकार बनने के बाद चंदन यादव ने पोस्टिंग में कुछ अफसरों की मदद भी की थी। बिहार के नेता चंदन यादव को न तो अब तक बिहार चुनाव में लगाया गया है और न छत्तीसगढ़ की जिम्मेदारी दी गई है, ऐसे में यहाँ के यादव नेता और उनके समर्थकों में मायूसी छाने की खबर है।

(डिस्क्लेमर – हमने लेखक के मूल लेख में कोई भी बदलाव नही किया है। प्रकाशित पोस्ट लेखक के मूल स्वरूप में है।)

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