- लोगों को मोक्ष के राह तक पहुंचाने पर मिलती है शांति
- लड़की होकर दे रही अनजान को कंधा
रायपुर। इंसान के जन्म से लेकर मृत्यु तक कोई का कोई संस्कार चलते ही रहता है। जन्म के बाद छट्टी से शुरु यह संस्कार अंत में मोक्ष प्राप्त करने के लिए अंतिम संस्कार में जाकर थमता है। नवरात्र के छठवे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। इनकी पूजा करने वालों को धर्म, कर्म, काम और मोक्ष प्राप्त होता है। आज हम देवी की एक ऐसी प्रतिछाया डॉ. निम्मी चौबे से अपको रूबरू कराएंगे जो लड़की होने के बाद भी अनजान लोगों को मोक्ष दिलाने का काम कर रही हैं, कंधा दे रही है और उनके शव को मुखागनी देकर उन्हें मुक्ती के मार्ग तक पहुंचा रही हैं।
निम्मी पेशे से डॉक्टर हैं। अपने काम के जरिए वह लोगों की पीढ़ा तो दूर करती ही हैं, साथ ही जरूरतमंदों का साथ भी देती हैं। पिछले दो साल से डॉ चौबे लावारिस शव का दाहसंस्कार करने का काम कर रही हैं। उनकी सोच है कि जन्म से लेकर मुत्यु के बाद का सबसे आखरी संस्कार अंतिम संस्कार होता है, जिसे अच्छे से करना चाहिए। आए दिन ऐसा सुनने में आता था कि लावारिस लाश मिली सोच कर काफी दुख लगता था कि वह कौन होगा जो जीवन के आखरी पड़ाव में पहुंच गया है उस वक्त न अपने साथ है और न ही उनकी संतान उनका दाहसंस्कार करने के लिए भी नहीं है। तभी से उन्होंने ने लावारिस लाश का अंतिम संस्कार करना शुरू किया। ये संस्कार का कर्म विधिवत किया जाता जिससे आत्मा को शांति मिले। इतना ही नही पित्र पक्ष में इनके लिए पूजा भी कराई जाती है।
डॉ चौबे बताती हैं कि अब तक लगभग 68 लोगों के शव को कंधा देकर अंतिम संस्कार किया है। उनके इस नेक काम में उनके साथ और भी कई बहने जुड़ गई हैं। एक लड़की होने के बाद यह काम करना हर किसी के लिए चैलेंजिंग था लेकिन हिम्मत और अच्छी सोच के कारण सब संभव होता चला गया। अब कभी भी कहीं ऐसा पता चलता है कि किसी की मृत्यु हो गई है और उनका अंतिमसंस्कार करने वाला कोई नहीं तो हम उनकी संतान बनकर उन्हें मोक्ष के रास्ते तक पहुंचाते हैं।
मां-पापा से मिली सीख
इस प्रेरणा भरे काम के लिए मां पापा से सीख मिली ये कहना है निम्मी का। पिता जी और मां दोनों का देहांत हो गया। उसके बाद लगा कि उन्हें शांति देने के लिए उनके बताए हुए रास्ते में चलना सबसे अच्छा होगा। यही कारण है कि मैं ज्यादा से ज्यादा लोगों की मदद करने की कोशिश करती हूं। क्लीनिक में कई ऐसे भी लोग आते हैं जिनके पास इलाज के लिए पैसा नहीं होता ऐसे में उन्हें मैं इलाज के लिए मना नहीं करती बल्कि उनका इलाज करती हूं। कोरोना काल में भी डॉ. चौबे ने कई जरूरत मंदों की मदद की और उन्हें राशन, पैसे दिए। उनका मानना है कि जबसे नेक काम यही है कि आप किसी जरूरतमंद की मदद करें और उनका साथ दें।
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