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Ekhabri उज्जैन देवी दर्शन- 2 गढ़कालिका: महाकवि कालिदास की आराध्य देवी है उज्जैन में विराजमान



  

रायपुर, अशोक महावार। नवरात्र यानि शक्ति की उपासना का पर्व। नवरात्र वर्ष में दो बार आते हैं, चैत्र नवरात्र और शारदीय नवरात्रि। इन नौ दिनों में माँ के नौ रूपों की उपासना की जाती है। हिन्दू धर्म के अनुसार यह मान्यता है कि जहां-जहां सती देवी के शरीर के अंग गिरे वहां-वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। यह शक्तिपीठ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर फैले हुए है। उन्ही शक्तिपीठों में से एक है नगरी उज्जैन में स्थित गढकालिका धाम जहां महाकवि और नाटककार कालिदास को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। 


माँ के 51 शक्तिपीठों में से एक उज्जैन का गढकालिका शक्तिपीठ जहाँ सारे भारत उपमहाद्वीप में प्रसिद्ध है, तो वही तंत्र विद्या की प्राप्ति के लिए भी इसका बढा महत्व है जहाँ पर बहुत दूर-दूर से तांत्रित सिद्धि हासिल करने लोग आते है। वही इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालु कवि कालिदास के अनुरूप ज्ञान प्राप्ति की माँ गढ़ कालिका से मनोकामना करते है और अपने आप को इस दरबार में पाकर खुश होते है। श्रद्धालुओं की मने तो यहाँ आने के बाद उनके सभी कष्ट दूर हो जाते है।



मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक नगरी उज्जैन, इसकी पहचान है यहां स्थित स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकाल ज्योतिर्लिंग की वजह से। लेकिन विक्रमादित्य की यह नगरी अपने आप में एक और इतिहास छुपाए हुए है। वह इतिहास है माँ शक्ति का जो यहां गढकालिका के रूप में विराजमान है। कहा जाता है कि संस्कृत के महान कवि कालीदास को माँ गढकालिका के आशीर्वाद से ही ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। ऐसी मान्यता है कि प्रारंभिक जीवन में कालीदास अनपढ़ और मूर्ख थे। कालीदास एक बार एक पेड़ की जिस डाली पर बैठे थे उसी को काट रहे थे इस घटना पर उनकी पत्नी विद्योत्तमा ने उन्हें ऐसी फटकार लगाई जिसके फलस्वरूप तपस्या कर महामूर्खों की श्रेणी में आने वाले कालीदास ने गढ़कालिका देवी की उपासना कर महाकवि कालिदास बन गए। 

उज्जैन में स्थित गढकालिका देवी का मंदिर आज के उज्जैन नगर में प्राचीन अवंतिका नगरी क्षेत्र में है। कालयजी कवि कालिदास गढकालिका देवी के उपासक थे। इस प्राचीन मंदिर का सम्राट हर्षवर्धन द्वारा जीर्णोध्दार कराने का उल्लेख मिलता है। गढ़कालिका के मंदिर में माँ कालिका के दर्शन के लिए रोज हजारों भक्तों की भीड़ जुटती है। तांत्रिकों की देवी कालिका के इस चमत्कारिक मंदिर की प्राचीनता के विषय में कोई नहीं जानता, फिर भी माना जाता है कि इसकी स्थापना महाभारतकाल में हुई थी, लेकिन मूर्ति सतयुग के काल की है। बाद में इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार सम्राट हर्षवर्धन द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है। वही स्टेट काल में ग्वालियर के महाराजा ने इसका पुनर्निर्माण करावाया था।

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पुराणों के अनुसार सती के पिता दक्ष प्रजापति ने कनखल (हरिद्वार) में बृहस्पति सर्व नामक यज्ञ करवाया था, जिसमें सभी देवताओं को तो बुलाया पर जान बूझकर अपने जमाता भगवान शंकर को इसमें आमंत्रित नहीं किया। जिसका सती ने विरोध किया। जिसको लेकर सती के पिता दक्षप्रजापति ने शिव को अपशब्द कहे जिससे दुखी होकर सती ने यज्ञ में अपनी ही आहुति दे दी। जिसके बाद शिव इतने क्रोधित हुए कि उन्होने अपना तीसरा नेत्र खोलकर तंडव करना शुरू कर दिया। जिसके बाद मृत सती के शरीर को लेकर वह पूरे ब्राह्ममांड में घूमने लगे। सती के मृत शरीर के अंग जहाँ जहाँ गिरे वहाँ वहाँ शक्तिपीठों की स्थापनी की गई। उज्जैन में ‍शिप्रा नदी के तट के पास स्थित भैरव पर्वत पर माँ भगवती सती के ओष्ठ गिरे थे। जिस कारण यहाँ शक्तिपीठ की स्थापना हुई। तांत्रिकों की देवी कालिका के इस चमत्कारिक मंदिर की प्राचीनता के विषय में कोई नहीं जानता, पर पुराणों में उल्लेख जरूर मिलता है।



यहाँ पर नवरा‍त्रि में लगने वाले मेले के अलावा भिन्न-भिन्न मौकों पर उत्सवों और यज्ञों का आयोजन होता रहता है। माँ कालिका के दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग आते है। यहां नवरात्री पर्व पर भक्तों की भीड़ और देवी दर्शन के लिए उज्जैन में नवरात्री की धूम मची हुई है। कोई भक्त ने उपवास रख कर माता की आराधना की है, तो कोई चप्पल छोड़ कर अपना प्रण पूरा करता दिख जाएगा। यहां दोनों ही नवरात्री में गढ़ कालिका मंदिर में माँ कालिका के दर्शन के लिए रोज हजारों भक्तों की भीड़ जुटती है। माँ गढ़ कालिका पर भक्तों की श्रद्धा देखते ही बनती है। 


महाकवि कालिदास द्वारा रचित श्यामला दंडक महाकाली स्तोत्र एक सुंदर रचना है। ऐसा कहा जाता है कि महाकवि के मुख से सबसे पहले यही स्तोत्र प्रकट हुआ था। यही नहीं उज्जैन में अंतरराष्ट्रीय रूप से आयोजित होने वाले कालिदास समारोह के आयोजन के पूर्व माँ कालिका की आराधना की जाती है। 

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