Google Analytics Meta Pixel महान भूमकाल के सूत्रधार चिंटू हल्बा की अनकही कहानी शोधकर्ताओं की जुबानी - Ekhabri.com

महान भूमकाल के सूत्रधार चिंटू हल्बा की अनकही कहानी शोधकर्ताओं की जुबानी

बस्तर अपने आप में कई अनगिनत कहानियों को अपने में समेटे हुए है। ऐसी ही एक सच्ची घटना और हल्बा समाज के गौरवशाली इतिहास है, जो वक्त के पन्नो में दबी गुमनामी की ओर जा रही थी, जिसे शोधकर्ताओं इतिहासकारों और समाज के लोगो के अथक प्रयास से अब देश दुनिया के लोग जानने लगेंगे। दरअसल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चिंटू देहारी हल्बा के बारे में इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का कहना है अंग्रेजो के दमनकारी नीतियों से विद्रोह में चिंटू देहारी की अहम भूमिका थी। अंतागढ़ से महज 20 km की दूरी पर ग्रामपंचायत कोलर में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चिंटू देहारी हल्बा का मूर्ति अनावरण किया गया।

 

 

 

 

इतिहासकार, शोधकर्ताओं और सामाजिक वरिष्ठजनों के बताए अनुसार जल, जंगल जमीन के हक की लड़ाई ने आदिवासी वीरों के स्वाभिमान को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 1910 के कालखंड में समूचा बस्तर अंचल ब्रिटिश दासता से मुक्ति की आस में छटपटा रहा था। बस्तर रियासत के पूर्व दीवान लाल कालेंद्र सिंह और राज माता सुवर्ण कुमारी देवी की उपेक्षा और आदिवासियों के शोषण और अत्याचार ने भूमकाल जैसे क्रांतिकारी आंदोलन को जन्म दिया। भुमकाल आंदोलन की प्रारंभिक रणनीति या कहे गुप्त बैठकें ग्राम ताड़ोकि तहसील अंतागढ़ जिला कांकेर में स्थित दंतेश्वरी मातागुड़ी में होती थी। राजपरिवार के सदस्य लाल कालेंद्र सिंह राज माता सुवर्ण कुमारी देवी (सुबरन कुंवर), वीर गुण्डाधुर के साथ कोलर परगना के जमींदार चिंटू हलबा (देहारी)। भी इन महान भूमकाल के शूत्रधारों में शामिल थे। शासकीय दस्तावेजों से इस तथ्य की पुष्टि होती है की कोलर, ताड़ोकी क्षेत्र में चिंटू हलबा ने विद्रोह का नेतृत्व किया।
फरवरी 1910 तक आंदोलन का विस्तार हो चुका था। बस्तर के प्रायः सभी समुदाय ने इस आंदोलन में भाग लिया था। दक्षिण बस्तर के कुछ जमींदारों को छोड़ समूचा बस्तर क्रांति की आग में झुलस रहा था। मार्च 1910 तक विद्रोह को कठोरता पूर्वक कुचला गया।

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नारायणपुर जिला अंतर्गत अबूझमाड़, छोटेडोंगर और महाराष्ट्र राज्य के सीमावर्ती क्षेत्र आंदोलन के प्रभाव में थे। नारायणपुर से धर्मा पातर, बहीदार रामधार, कुपाल सहित और भी क्रांतिकारियों ने ताड़ोकी में हुए गुप्त बैठकों में अपनी भागीदारी दी थी । ब्रिटिश हुकूमत को वर्तमान नारायणपुर जिला के अबूझमाड़ क्षेत्र और छोटेडोंगर में भूमकाल क्रांतिकारियों को दबाने में खासी मशक्कत करनी पड़ी थी। अबूझमाड़ का कुतुल ग्राम और छोटेडोंगर विद्रोह के प्रमुख केंद्र थे , छोटेडोंगर में भूमकाल का नेतृत्व आयतू माहरा ने किया था। भूमकाल आंदोलन लंबे समय तक आदिवासियों को संघर्ष के लिए प्रेरणा और ऊर्जा देने में विफल रहा, लेकिन आदिवासी जननायकों के अदम्य साहस, कुशल नेतृत्व और वीरता ने राष्ट्रीय स्तर पर जनमानस को प्रभावित किया और स्वतंत्रता आंदोलन की भावी पृष्ठभूमि तैयार करने में प्रेरक का कार्य किया।

 

 

 

 

चिंटू हलबा देहारी भूमकाल के ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे जो अंग्रेज सरकार द्वारा किए गए अत्याचारों और शारीरिक यातनाओं का भी शिकार हुए। चिंटू देहारी का जन्म 03 अक्टूबर 1880 में कोलर परगना में हुआ। उनके पिता का नाम रघुनाथ हल्बा था और वे कोलर परगना के जमींदार हुआ करते थे और लोक साहित्यकार एवं सामाजिक शोधकर्ता भागेश्वर पात्र बताते है। थाना रावघाट से प्राप्त VCNB (ग्राम अपराधपुस्तिका)1932- 33 और ग्रामीणों के बयान से इस बात पर मुहर लगती है कि चिंटू हलबा ने कोलर, तडोकी क्षेत्र में विद्रोह का नेतृत्व किया ,भारत की तरह बस्तर के मूल निवासियों ने भी अंग्रेजो के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंका था , यह विद्रोह 1910 के जनवरी, फरवरी, मार्च तक चला था, जिसका अंग्रेजों ने दमन किया, चिंटू हलवा को गिरफ्तार करके लाल बाग में बहुत मारा पीटा गया और अन्य क्रांतिकारी साथियों के साथ सजा दी गई। चिंटू देहारी के द्वारा लिखित ताड़पत्र एक पांडुलिपि ग्रंथ है, जो उनके वंशज दलपत देहारी के पास आज भी सुरक्षित है।

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