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कही-सुनी (24 0CT-21): मंच के पीछे की कहानियाँ- राजनीति, प्रशासन और राजनीतिक दलों की

रवि भोई ( लेखक, पत्रिका समवेत सृजन के प्रबंध संपादक और स्वतंत्र पत्रकार हैं।)



टीएस सिंहदेव का दिल्ली में डेरा के मायने

छत्तीसगढ़ में कयासों का बाजार गर्म है। स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव के दिल्ली में डेरा डाल देने से अफवाहों की सनसनाहट बनी हुई है। कहते हैं मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल टीएस सिंहदेव इस बार हाईकमान से कुछ न कुछ फैसला चाहते हैं। राज्य में पिछले चार महीने से नेतृत्व परिवर्तन के संघर्ष का बादल छाया है। चर्चा है इस बार टीएस सिंहदेव “पद दो या पद लो” की मांग के साथ दिल्ली में बैठे हैं। कहते हैं इसी के चलते वे अंबिकापुर के सरकारी अस्पताल में हादसे के बाद विशेष विमान से आए और गए, फिर दिल्ली से ही वीडियो कांफ्रेंसिग के जरिए विभागीय बैठक ली। अब कांग्रेस हाईकमान टीएस सिंहदेव की कब सुध लेता है, यह देखना होगा ? लोगों को अब लगने लगा है,कहीं टीएस सिंहदेव की बात ‘नक्कारखाने में तूती की आवाज’ बनकर न रह जाय ? मध्यप्रदेश, गोवा और पंजाब के बाद शुक्रवार को ओडिशा प्रदेश कांग्रेस समिति के कार्यकारी अध्यक्ष प्रदीप कुमार मांझी का इस्तीफा कांग्रेस नेतृत्व पर सवालिया निशान है। प्रमुख आदिवासी नेता और नबरंगपुर लोकसभा क्षेत्र के पूर्व सांसद मांझी जाते-जाते पार्टी में अब ‘‘उत्साह की कमी’ जैसी टिप्पणी भी कर गए। छत्तीसगढ़ में भी लोग अब कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल खड़े करने लगे हैं। लोग कहने लगे हैं कि हाईकमान को साफ़ करना चाहिए कि भूपेश बघेल रहेंगे या टीएस सिंहदेव आएंगे ?

मंत्रीजी का फोन नहीं उठाया अफसर ने

कहते हैं राज्य की संस्कृति और विरासत को जन-जन तक पहुंचाने वाले एक विभाग के अधिकारी ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के खासमखास कहे जाने वाले एक मंत्री के काम को भी दरकिनार कर दिया और उनका फोन भी रिसीव नहीं किया। अफसर मंत्रीजी के विभाग का ही है, फिर भी अफसर की गुस्ताखी लोगों को समझ नहीं आ रहा है। बेअदबी और लापरवाही के लिए मंत्री जी ने अफसर को निलंबित करने का फरमान जारी कर दिया, पर अफसर की इस तरह अशिष्टता से कई सवाल खड़े होते हैं। कहा जा रहा है भाजपा शासन में अफसर के करीबी की तूती बोलती थी। शायद इसीलिए तीन साल बाद भी अफसर के सिर से पावर का नशा न उतरा हो।

मुख्यमंत्री की खरी-खरी

चर्चा है कि डिप्टी कलेक्टर को एक विभाग का मुखिया बनाए जाने के मसले पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अधिकारी-कर्मचारी नेताओं को खरी-खरी सुना दी। कहते हैं एक घोषणा पर मुख्यमंत्री के प्रति आभार प्रकट करने पहुंचे अधिकारी-कर्मचारी नेताओं ने डिप्टी कलेक्टर को विभाग का मुखिया बनाए जाने की चर्चा छेड़ी। नेताओं ने विभागीय अधिकारियों में भारी नाराजगी का जिक्र करते हुए उनसे फैसला पलटने का आग्रह किया। कहा जा रहा है मुख्यमंत्री ने साफ़-साफ़ कह दिया कि विभाग के अधिकारी ठीक से काम नहीं कर रहे थे, इस कारण वहां राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी को बैठाना पड़ा। कहा जा रहा है मुख्यमंत्री की खरी-खरी के बाद विभाग के अफसर कोरोनाकाल में किए काम और अब तक सरकार की छवि चमकाने में बहाए पसीना के आंकलन में जुटे हैं।

गांजा तस्करी रोकने के लिए बार्डर में लगेंगे कैमरे

कहते हैं गांजे की तस्करी रोकने के लिए सरकार बार्डर पर कैमरे लगाकर निगरानी करने वाली है। सवाल है कि तस्कर कैमरे में कैद हो जाएंगे , तो होगा क्या ? तस्कर पकड़ाते हैं और लेन-देन के साथ मामला रफा-दफा हो जाता है , या वे कुछ जुर्माना या सजा के साथ छूट जाते हैं। तस्करों के गिरोह या फिर बड़े लोगों पर तो पुलिस हाथ डाल ही नहीं पाती। पुलिस को तस्करों के तह की जानकारी नहीं है , ऐसी बात भी नहीं, पर उनके लंबे हाथ के सामने पुलिस बौना हो जाती है। सबको पता है गांजा ओडिशा से आता है और मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश जाता है। कहते हैं गांजा तस्करी रूट वाले जिलों में पुलिस महकमे में ऊपर से नीचे तक सभी की पांचों अंगुलियां घी में होती हैं। लोगों का कहना है मादक पदार्थों की तस्करी पर ढपली बजाना छोड़ सरकार को ठोस काम करना चाहिए । नारकोटिक्स कंट्रोल व्यूरो की तरह राज्य में गांजा ,चरस और अफीम की तस्करी रोकने के लिए पुलिस मुख्यालय में अलग सेल बनाया जाना चाहिए। हुक्का बार आदि पर रोक का काम भी उसे सौंपे। राजधानी में ही जिस तरह हुक्का बार खुल गए, उससे तो लगता है , दीया तले ही अँधेरा है।

धान खरीदी कब से पता नहीं ?

समर्थन मूल्य पर धान खरीदी कब से होगी, सरकार ने अभी तय ही नहीं किया है। कहते हैं पिछली सरकार में एक नवंबर से धान खरीदी होती थी। भूपेश सरकार पिछले दो साल से नवंबर की जगह दिसंबर से खरीदी कर रही है। धान खरीदी की तारीख तय नहीं होने के साथ भुइंया पोर्टल से धान बेचने के लिए किसानों का रजिस्ट्रेशन बंद होने की शिकायत भी आ रही है। चर्चा है कि यह मुद्दा कलेक्टर्स कांफ्रेंस में भी उठा। कहते हैं अभी बारदाना की स्थिति भी साफ़ नहीं है। दीवाली के पहले तक धान खरीदी की तारीख तय नहीं होने और बिक्री के लिए रजिस्ट्रेशन बंद होने से किसान तो असमंजस की स्थिति में हैं। राज्य में जल्दी पकने वाले धान की फसल तो कटने भी लगी है।

गृह विभाग में अफसरों का जमावड़ा

राज्य के गृह विभाग में अब अपर मुख्य सचिव समेत पांच सीनियर अफसर हो गए हैं। सुब्रत साहू अपर मुख्य सचिव हैं, साथ में आईएएस धनंजय देवांगन, आईपीएस अरुणदेव गौतम और आईपीएस नेहा चंपावत सचिव हैं। आईएएस अभिजीत सिंह संयुक्त सचिव हैं। कुछ साल पहले तक गृह विभाग एक ही सेक्रेटरी के भरोसे चला। कहते हैं गृह विभाग में कामकाज के बंटवारे में अभिजीत सिंह को वजनदार बनाया गया है। आईपीएस और राज्य पुलिस सेवा की स्थापना शाखा से लेकर दूसरे महत्वपूर्ण काम अभिजीत सिंह के पास है। कहा जा रहा है राज्य में बढ़ती कानून-व्यवस्था की समस्या और नक्सलवाद के चलते गृह विभाग में अफसरों का जमावड़ा जरुरी है।

मंत्री जी की दिल्ली यात्रा में बढ़ी सुरक्षा

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के लिए दिल्ली जाकर शक्ति प्रदर्शन में शामिल नहीं होने वाले राज्य के मंत्री की दिल्ली यात्रा पर कड़ी सुरक्षा चर्चा में है। कहते हैं मंत्री जी पिछले हफ्ते 3-4 दिन के लिए दिल्ली गए थे। कहा जा रहा है कि मंत्रीजी की सुरक्षा टाइट करने के लिए सरकार ने फरमान जारी किया था। मुख्यमंत्री की विपरीत धारा वाले मंत्री की सुरक्षा के मायने तलाशे जा रहे हैं। कुछ लोग इसे मंत्री की निगरानी के तौर देख रहे हैं तो कुछ लोग बढ़ते रुतबे से जोड़ रहे हैं। नक्सली इलाके से ताल्लुक रखने वाले मंत्री होते तो बात अलग होती , मैदानी इलाके के मंत्री की दिल्ली यात्रा पर सुरक्षा बढ़ाना लोगों के दिमाग में कौंध रहा है।

कलेक्टर और ला एंड आर्डर

लगता है कवर्धा की घटना के बाद कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार जागी है और जिले में कानून-व्यवस्था के लिए कलेक्टरों को भी उत्तरदायी बनाया है। लोग कह रहे हैं राज्य में कलेक्टरों के लिए कानून-व्यवस्था से ज्यादा महत्वपूर्ण डीएमएफ हो गया था, इस कारण कलेक्टर्स कांफ्रेंस में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को कानून-व्यवस्था के लिए कलेक्टरों को जिम्मेदार बनाना पड़ा। वैसे कलेक्टर जिला दंडाधिकारी होते हैं , इस नाते जिले में ला एंड आर्डर बनाए रखना उनकी जिम्मेदारी है। कहा जाता है पुराने जमाने के कलेक्टर अपनी गाडी में डंडे लेकर चलते थे और वक्त पर इस्तेमाल भी करते थे।

पदयात्रा की राजनीति

बस्तर और सरगुजा के आदिवासियों के बाद अब रावघाट इलाके के आदिवासी भी राजधानी तक पैदल मार्च करने वाले हैं। सरगुजा के आदिवासी हसदेव अरण्य में कोल ब्लाक आवंटन के खिलाफ रायपुर आकर मुख्यमंत्री से मिले, तो बस्तर ग्राम पंचायत को नगर पंचायत बनाने के विरोध में वहां के लोगों ने राजधानी तक पदयात्रा की । कहते हैं रावघाट इलाके के 58 गांव के लोग अपनी मांगों को लेकर रायपुर आ रहे हैं। वैसे हसदेव अरण्य इलाके में कोल ब्लाक के लिए वन विभाग ने अधिसूचना जारी कर दी है।

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(डिस्क्लेमर – हमने लेखक के मूल लेख में कोई भी बदलाव नही किया है। प्रकाशित पोस्ट लेखक के मूल स्वरूप में है।)

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